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मिश्रित दोहे -2

आसमान में चाँद का, बड़ा अजब है खेल।
भानु सँग होता नहीं, कभी चाँद का मेल।।

नैन मिलें जब नैन से, जागे मन में प्रीत।
दो पल में सदियाँ मिटें, बने हार भी जीत।।

बंजारी सी प्यास ने, व्यथित किया शृंगार।
अवगुंठन में प्रीत के, शेष रहे अँगार।।

आखों से रिसने लगा, बेआवाज़ अज़ाब।
अश्कों के सैलाब में, डूब गए सब ख्वाब।।

रिश्तों से आती नहीं, अपनेपन की गंध।
विकृत सोच ने कर दिए, दुर्गन्धित संबंध।।

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by babitagupta on September 5, 2018 at 6:11pm

आखिरी दो पंक्तियाँ बेहतरीन,हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सुशील सरजी।

Comment by Sushil Sarna on September 5, 2018 at 4:41pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'जी सृजन को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 5, 2018 at 4:40pm

आदरणीय narendrasinh chauhan जी सृजन को  मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 5, 2018 at 4:40pm

आदरणीय  Shyam Narain Verma जी सृजन को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 5, 2018 at 4:39pm


आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है। आपके द्वारा इंगिंत त्रुटि तो मैंने संशोधित कर दिया है। अब आपको ठीक लगेगा। इस हेतु आपका तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 5, 2018 at 8:39am

आ. भाई सुशील जी, अच्छे दोहे निकाले हैं । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on September 4, 2018 at 11:38am

जनाब नरेन्द्र सिंह चौहान साहिब आदाब,

/खुब सुन्दर//

"कैसे समझाऊँ.."?

Comment by narendrasinh chauhan on September 4, 2018 at 11:29am

खुब सुन्दर

Comment by Shyam Narain Verma on September 3, 2018 at 12:17pm

आदरणीय सुशील सरना जी  प्रणाम , सुंदर भाव से संजोयी रचना पर बधाई स्वीकारें , सादर.

Comment by Samar kabeer on September 3, 2018 at 11:59am

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छे दोहे रचे आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

अवगुंठन में मिलन के'

'मिलन के'122--212 होना था न?

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