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नैन कटोरे ..

नैन कटोरे
कब छलके
खबर न हुई
बस
ढूंढता रहा
भीगे कटोरों से
अपना मयंक
उस मयंक में

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on September 5, 2018 at 4:42pm

आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी सृजन को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 1, 2018 at 9:11pm

आदरणीय सुशील सरना जी सादर नमस्कार, कम शब्दों में भावों की गंगा ही बहा दी आपने, वाह आनन्द आ गया 

Comment by Sushil Sarna on September 1, 2018 at 8:20pm

आदरणीय ब्रजेश नीरज जी , सादर प्रणाम। .. आपके सुझाव से मैं सहमत हूँ। हार्दिक आभार इस हेतु। दूसरी बात अंतिम दो पंक्तियों में मेरा आशय ये था अपना मयंक अर्थात अपना प्यार , अपना चाँद उस मयंक में अर्थात नभ के चाँद में या संक्षेप में यूँ कहें कि नभ के चाँद में मैं अपने चाँद को या अपने प्यार को ढूँढता रहा। कुछ ऐसे ही भावों को पंक्तियों में बाँधने का प्रयास किया था मैं। सादर। ....

Comment by बृजेश नीरज on September 1, 2018 at 8:05pm

आदरणीय पहली बात कि चन्द्र बिन्दु के स्थान पर उसका प्रयोग उचित होता है. 

आख़िरी की दो पंक्ति का आशय समझाने का कष्ट करें.

सादर!

Comment by Sushil Sarna on September 1, 2018 at 7:56pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 1, 2018 at 7:55pm

आदरणीय Samar kabeer, आदाब ..... सृजन पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on September 1, 2018 at 7:54pm

आदरणीय मो आरिफ़ साहिब, आदाब ..... सृजन पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 1, 2018 at 7:18pm

आ. भाई सुशील जी, बेहतरीन कविता हुयी है । हार्दिक बधाई

Comment by Samar kabeer on September 1, 2018 at 12:29pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत सुंदर कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Mohammed Arif on August 31, 2018 at 10:47pm

आदरणीय सुशील सरना जी आदाब,

                          बहुत ही सुंदर पेशकश । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

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