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तरही ग़ज़ल (212-212-212-212)

(212-212-212-212)

मेरे सुर से तेरा सुर मिलाना हुआ
और जीवन मेरा इक तराना हुआ ॥

मैने देखी है इक चलती फ़िरती ग़ज़ल
है मिजाज इस लिए शायराना हुआ ॥

आइए हमनशी बैठिए पलकों पर
ये कहें  ख्वाब में कैसे आना हुआ ॥

थी दवा तो वही काम तब कर गई
जब तेरा अपने हाथों पिलाना हुआ ॥

वो भी लगने लगे अब मुझे अपने से
"जब से गैरों के घर आना जाना हुआ ॥"

हज़्म कैसे करेंगे मेरी ये ग़ज़ल
वो जो खाते हैं बारीक छाना हुआ ॥

देख के तुझ को ये ठण्डी आहें भरे
दिल मेरा बर्फ़ का कारखाना हुआ ॥

(मौलिक एवम अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 8, 2017 at 11:44am

आ. भाईगुरप्रीत जी  सुंदर गजल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकारें ।

Comment by Ravi Shukla on May 8, 2017 at 9:34am

आदरणीय गुरप्रीत जी मुबारक बाद कुबूल करें इस गजल के लिये और आपकी शेर कहने के प्रति लगन के लिये

मैने देखी है इक चलती फ़िरती ग़ज़ल
है मिजाज इस लिए शायराना हुआ ॥  क्‍या कहने इस शेर के  वाह बधाई

कमोबेश शाईरी की शुरुआत इसी तरह के मिजाज़ से होती है :-)))

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 5, 2017 at 11:52pm
वाह क्या खूबसूरत अंदाज है आदरणीय..बहुत ही शानदार ग़ज़ल हुई सादर
Comment by Gurpreet Singh jammu on May 5, 2017 at 8:45pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय गिरिराज जी
Comment by Gurpreet Singh jammu on May 5, 2017 at 8:44pm
आदरणीय अनुराग जी बहुत बहुत धन्यवाद...ऐसे प्रोत्साहन से ही मेरे जैसा कम क्षमता वाला भी कभी कभी अपनी क्षमता से बढ़ कर काम करने के काबिल हो जाता है.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 5, 2017 at 8:32pm

आदरणीय , गुरप्रीत भाई , बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने .. शे र दर शेर आपको हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Gurpreet Singh jammu on April 19, 2017 at 7:36pm
जी आदरणीय सौरभ जी..बात अब कुछ कुछ समझ में आई है.. बहुत बहुत शुक्रिया आपका..

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 19, 2017 at 12:21pm

आप ओबीओ पर बने रहें आदरणीय गुरप्रीत जी, समयानुसार आप बहुत कुछ सीखते जायेंगे. इस पटल पर ऐसे ही सभी सीखते हैं. 

आपकी कोशिश क़ामयाब हुई है. और आपकी लगन का स्वागत है. 

और देखिए, आ० नीलेश भाई ने किस मुलामियत से आपके उक्त शेर के सानी मिसरे में जान डाली है. यही ग़ज़ल कहने की ख़ासियत है. वैसे यह अंदाज़ सीखते-सीखते आती है. लेकिन इसका गुमान तो होना ही चाहिए. ग़ज़ल वस्तुतः बातचीत के अंदाज़ को मिसरों में पिरोने की कला है. इसीलिए ग़ज़लों में प्रयुक्त हुए शेरों के मिसरे किसी गेय कविता या गीत जैसी विधाओं की पंक्तियों से अलग हुआ करते हैं. इस तथ्य के प्रति सचेत रहा करें.

शुभेच्छाएँ 

Comment by Gurpreet Singh jammu on April 11, 2017 at 10:56am

हौसला अफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया आदरणीय नीलेश जी,,,,आपकी बात का ध्यान रखूँगा...... हालाँकि फिलहाल मुझे यह समझना थोड़ा मुश्किल लग रहा है 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 11, 2017 at 7:38am

आ. गुरप्रीत जी..
बहुत ख़ूब....
आप की उत्तरोत्तर प्रगति साफ़ दिखाई दे रही है ..
.
आइए हमनशी बैठिए पलकों पर
बोलिए ख्वाब में कैसे आना हुआ ॥.... या 
.
आइए हमनशी बैठिए पलकों पर
ये कहें!! ख्वाब में कैसे आना हुआ ॥ क्या अधिक    ग़ज़ल जैसा है ....यहाँ थोडा वक़्त दिया कीजिये ..
.
सादर 

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