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"नूर के उत्सव" - [लघुकथा] 27 - शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"नूर के उत्सव" - (लघुकथा)

"स्कूल में टोफी बांटेगा बर्थ-डे पर ! खिलौने चाहिए ! दीवाली पर पटाखे फोड़ेगा, काफिर ! ज़रा कमा के तो दिखा ! "- यही तो कहा था अब्बू ने। सचमुच कितना कठिन है पैसा कमाना, दो -तीन घंटे हो गये, दो दोस्तों के अलावा किसी ने दीपक नहीं ख़रीदे । हम मुसलमान हैं, तो क्या कोई हम से दिये नहीं ख़रीदेगा ? ये दीपक हिन्दू हैं क्या ? सड़क पर पेड़ के नीचे अपनी दियों की दुकान पर बैठे नूर को निराशा घेर रही थी। क्या उसकी गुल्लक के पैसों से ख़रीदवाये गये ये दीपक पूरे बिक पाएँगे ? कितने पैसे कमा पाऊंगा बर्थ-डे मनाने के लिए , पटाखों के लिए?

फिर उसके मन में विचार आया- "नहीं, ये तो बार-बार ज़िद करने की सजा दी है मुझे अब्बू ने ! पैसों की बात पर अम्मी को भी तो पीटते हैं कभी कभी ! ऐसा क्यों है कि मुसलमानों में बर्थ-डे नहीं मना सकते, दीवाली पर पटाखे नहीं फोड़ सकते ?" कुछ याद करके नूर की आँखों में आँसू भर आये । क्या मुसलमानों में पैसों की बात पर औरत को पीटना मना नहीं है ? बहुत से सवाल नन्हे मन में एक साथ उठ रहे थे।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2017 at 4:00am
मेरी इस ब्लोग-पोस्ट पर समय देने हेतु सभी पाठकगण को तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 8, 2015 at 7:53pm
आदरणीय Shrivastava Amod Bindouri जी, आदरणीया राहिला साहिबा, आदरणीय मोहन बेगोवाल जी, आदरणीया Pratibha Pandey जी व आदरणीय सतविंदर कुमार जी, मेरी इस लघु-कथा के मर्म को समझते हुए टिप्पणियों द्वारा अपने विचार व अपने अनुभव बताते हुए मेरी हौसला अफज़ाई हेतु हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आप सभी को।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 8, 2015 at 7:51am
बच्चे तो बच्चे होते हैं,दिल के अच्छे होते हैं।कितने ही कोमल हृदयी बच्चे ऐसे ही'काफिर'कहलवाते होंगे।बेहद उम्दा रचना के लिए हृदयतल से बधाई आदरणीय उस्मानी जी।
Comment by मोहन बेगोवाल on November 7, 2015 at 7:52pm

 आदरणीय शेख उस्मानी बच्चा जिस समाज में रहता, उसी समाज से पभावत होता ,इस लिए उस से उस समाज के कल्चर से दूर नहीं कर सकते, इस बहुत ही अच्छी  लघुकथा की बधाई हो 

Comment by pratibha pande on November 7, 2015 at 7:48pm

आपकी कहानी पढ़कर एक बात याद आई ,उज्जैन में महाकाल के मंदिर के बाहर शिवलिंग वगेहरा बेचने वाले मुस्लिम बंधू ही होते हैं ,हमारी इस गंगा जमुनी संस्कृति के जितने वारि जाएँ कम है , आपकी ये कथा कई प्रश्न खड़े करती है ,बधाई इस ,सोचने को विवश  करती कथा  के लिए आदरणीय उस्मानी जी 

Comment by Omprakash Kshatriya on November 7, 2015 at 3:56pm

आदरणीय शेख उस्मानी जी आप ने बच्चे के मनोभावों को बहुत ही उम्दा तरीके से पेश किया है. बधाई आप को .

Comment by Rahila on November 7, 2015 at 3:25pm
बहुत अच्छी रचना आदरणीय उस्मानी जी! बहुत बधाई आपको ।
Comment by amod shrivastav (bindouri) on November 7, 2015 at 2:03pm
हाँ उस सच्चे जीव में बहुत से सवाल पलते है जो बस एक सही उत्तर की तलास पर मौन रह जाता है बहुत बढ़िया बधाई
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 7, 2015 at 12:34pm
रचना पर त्वरित उपस्थिति व असीम प्रोत्साहन देने के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय तेज वीर सिंह जी।
Comment by TEJ VEER SINGH on November 7, 2015 at 11:10am

हार्दिक बधाई आदरणीय शेख उस्मानी जी!बहुत मर्म स्पर्शी और समयानुकूल लघुकथा!

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