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"मीडिया से आइडिया" - [लघुकथा] 30 __शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"मीडिया से आइडिया" - (लघुकथा)

हालाँकि गुड्डन के तीनों बच्चे बहुत समझदार थे। काफी पहले से ही सब कुछ समझ रहे थे। कुछ ही दिनों में गुड्डन को फाँसी की सजा होने वाली थी। अम्मीजान के तो बुरे हाल हो रहे थे रो-रो कर। दादी माँ ने ही बच्चों को दिलासा देने के लिए उनसे कहा - " अच्छा-अच्छा सोचो, तो ग़म नहीं होगा। मुल्क के तमाम मशहूर लोगों की तरह तुम्हारे अब्बू मशहूर रहे हैं भले वो डकैती की दुनिया रही हो या दहशतग़र्दी की ! अखबारों में नाम छपता रहा है उनका। आज भी तो देखो , महान लोगों की तरह दुनिया भर के टीवी चैनलों में आतंकी गुड्डन को कवरेज मिल रहा है। लोग अपने-अपने कामों से ध्यान हटाकर टीवी, मोबाइलों, इन्टरनेट पर ताज़ी ख़बरें देख रहे हैं, स्कूली बच्चों के मुंह में बस गुड्डन का ही नाम है, कौन कहता है तुम्हारा बाप बदनाम है ! बदनाम होते , तो सब इन ख़बरों से परहेज़ करते !"- बोलते-बोलते दादी माँ ने पल्लू से अपनी आँखों के आँसुओं को पोंछा । फिर बोलीं - " कल तुम लोगों ने टीवी पर देखा था न कितने पुलिस वाले घेरे हुये थे तुम्हारे अब्बू को, जब विदेश से उसे लाया गया था। किसी बड़े नेता या सेलीब्रिटी से कम नहीं लग रहा था । उनकी तरह ही उसने भी अपने वतन के लिए लगाव ज़ाहिर किया था न ! बड़े- बड़े लोगों जैसी ज़िन्दगी तो जीता रहा वो, क्या कमी रखी तुम लोगों के लिए ? हराम का पैसा किस के पास नहीं है ? अपने बचाव के लिए किसी की जान ले लेने का काम कौन नहीं कर रहा ? बाबाओं ने भी क्या कोई कसर छोड़ी ? सब के सब "बदनामी" के तमग़े से "मशहूर" हो रहे हैं मीडिया की ही बदौलत । अरे, मरते तो सभी हैं एक दिन ! मीडिया की बदौलत ही "बदनामी" भी "शोहरत" में तब्दील हो रही है देखो ! गुड्डन को फाँसी हो जायेगी। शोहरत हासिल लोगों की तरह मय्यत में हज़ारों लोग शरीक़ होंगे । मीडिया पूरा कवरेज करेगा हफ़्तों तक। अगर लाश न भी दी तो बड़े-बड़े पुलिस अधिकारियों के सामने पूरे टीवी कवरेज के साथ उसे दफ़ना दिया जायेगा ! और तुम्हें पता भी है कुछ बड़े-बड़े नेताओं, ऐक्टरों की तरह तुम्हारा बाप तुम्हारे लिए कितनी धन-दौलत छोड़ कर जा रहा है !"

बच्चे सुन तो सब कुछ रहे थे, लेकिन स्कूली बच्चे होने व दीनी तालीमयाफ़्तां होने की वज़ह से अपनी मज़हबी अम्मीजान की तरफ़ देख-देख कर अंदर ही अंदर कुण्ठित हो रहे थे, रो रहे थे अपने नसीब पर ।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 8, 2017 at 4:17am
मेरी इस रचना पर समय देने हेतु सभी पाठकगण को तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 12, 2015 at 4:42pm
बहुत बहुत शुक्रिया जनाब सतविंदर कुमार साहब हौसला अफज़ाई हेतु।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 12, 2015 at 3:05pm
बेहद भावपूर्ण रचना।पारिवारिक संस्कार ही प्राथमिक तौर पर प्रभावित करते हैं किसी के भी आचरण को।हार्दिक बधाई आदरणीय उस्मान जी।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 11, 2015 at 12:31pm
बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरमा राहिला साहिबा। पूरी बात सामने रखने के लिए इससे ज़्यादा कसावट मुझसे नहीं हो पायी। दरअसल ऐसे विषय लम्बे आलेखों या उपन्यास के लिए उपयुक्त होते हैं। लेकिन मैं अभी केवल लघुकथा व काव्य लेखन पर फोकस कर रहा हूँ न !
Comment by Rahila on November 11, 2015 at 6:13am
बहुत अच्छी रचना आदरणीय उस्मानी जी! लेकिन रचना को थोड़ा और कसा जा सकता था । बहुत बधाई इस रचना हेतु । सादर ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 10, 2015 at 8:30pm
आदरणीय मिथिलेश वामनकर साहब व आदरणीय हरिकिशन ओझा जी सही समय पर रचना पर उपस्थित हो कर सटीक टिप्पणी कर प्रोत्साहित करने के लिए बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद।
Comment by harikishan ojha on November 10, 2015 at 6:11pm

आप ने आज के युग के  हिसाब  से बहुत ही सटीक और झकजोर देने वाली कथा लिखी है आप इसे  कथा नहीं सच्ची दास्ता कह सकते है,  जिस तरह से मीडिया ने याकूब के जनाज़े को कवरेज किया था, वो बहुत ही शर्मनाक था, आज देश में मीडिया एक ऐसा हथियार बन गया है जिस का ट्रैगर सिर्फ रसूकदार और राजनीतिगय ही दबा सकता है, जो देश की प्रगर्ति के लिए बहुत ही खतरनाक साबित हो सकता है, खेर छोड़िये ये तो चलता रहता है वोटो के लिए,  आप को इस कथा के लिए बधाई


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Comment by मिथिलेश वामनकर on November 10, 2015 at 1:50pm

आदरणीय उस्मानी जी बढ़िया कथा हुई है. कथ्य का मर्म भी स्पष्ट है. लेकिन थोड़ा और समय चाह रही है प्रस्तुति. इसे थोड़ा और सटीक और सुगठित किये जाने की सम्भावना शेष है. इस बेहतरीन कथानक पर दिल से बधाई.

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 10, 2015 at 12:42pm
कथा का उद्देश्य पूर्ण होने पर बड़ी ख़ुशी हासिल होती है। तहे दिल बहुत बहुत शुक्रिया जनाब तेज वीर सिंह जी सराहना व प्रोत्साहन देने के लिए।
Comment by TEJ VEER SINGH on November 10, 2015 at 11:31am

हार्दिक बधाई आदरणीय शेख उस्मानी जी !मीडिया के चरित्र को उजागर करती सुन्दर लघुकथा!मीडिया चाहे तो हीरो को ज़ीरो करदे और ज़ीरो को हीरो बनादे!

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