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भूख तक तो ठीक था - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२१२२/२१२२/२१२२/२१२


जिन्दगी की डाँट खाकर भी सँभल पाये न हम
चाह कर भी यूँ  पुराना  पथ  बदल पाये न हम।१।
**
एक संकट क्या उठा के साथ छूटा सबका ही
हाथ था सबने बढ़ाया किन्तु चल पाये न हम।२।
**
फर्क था इस जिन्दगी को जीने के अन्दाज में
आप सा छोटी खुशी पर यूँ उछल पाये न हम।३।
**
भूख तक तो ठीक था मुँह फेरकर सब चल दिये
लुट रही इन इज्जतों  पर क्यों उबल पाये न हम।४।
**
दूसरों  के  हित  में  जलना  सोच  में  पनपा  नहीं
पर स्वयं के हित भी बनकर दीप जल पाये न हम।५।
**
आप ने  पूछा  मुखौटे  क्यों  बदलते  रोज  हो
है वजह इसकी किसी साँचे में ढल पाये न हम।६।
**
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

Views: 506

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 29, 2020 at 8:04pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति से मान व उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by TEJ VEER SINGH on May 29, 2020 at 5:55pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी।बेहतरीन गज़ल।

भूख तक तो ठीक था मुँह फेरकर सब चल दिये
लुट रही इन इज्जतों  पर क्यों उबल पाये न हम।४।

आप ने  पूछा  मुखौटे  क्यों  बदलते  रोज  हो
है वजह इसकी किसी साँचे में ढल पाये न हम।६।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 28, 2020 at 4:09pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति, उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by Samar kabeer on May 28, 2020 at 2:28pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

बदलते  रोज  हो
'है वजह इसकी किसी साँचे में ढल पाये न हम'

इस मिसरे में 'वजह' शब्द ग़लत है, सहीह शब्द है "वज्ह"21,इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:-

'है सबब इसका किसी साँचे में ढल पाये न हम'

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 28, 2020 at 10:37am

आ. भाई अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति से मान व उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 28, 2020 at 9:45am

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी। आदाब, मन को कचोटती सुन्दर रचना के लिए आपको बहुत बधाईयाँ। 

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