For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

वहाँ एक आशिक खड़ा है ।

वहाँ एक आशिक खड़ा है ।
जो दिल तोड़ कर हँस रहा है ।।

मुहब्बत करें तो करें क्या ..?
मुहब्बत में धोका बड़ा है ।।

हमें आग का डर नहीं था ।
कि सैलाब अन्दर भरा है ।।

भले जिस्म थक हार जाए ।
अभी जोश दिल में बड़ा है ।।

ख़ुदा ख़ैर हमको मिले वो ।
ज़माना बहुत ही बुरा है ।।

कहांँ है जहाँ में मुहब्बत ।
सभी तो सभी से ख़फ़ा है ।।

हमें रात लड़ना पड़ा था ।
उजाला बहुत ग़मज़दा है ।।

यकीं कौन हम पे करेगा ।
ये ढांचा हमीं पे खड़ा है ।।

गुलाबों में कांटे बहुत है ।
गुलाबों से मन भर रहा है ।।

ये मिट्टी नहीं थी हमारी ।
हमें कुछ बदलना पड़ा है ।।

नहीं साथ अपना ही साया ।
अभी वक्त थोड़ा कड़ा है ।।

सुनो फिर से बदलेगा मौसम ।
मुझे मेरी मंजिल पता है ।।

डिम्पल शर्मा
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 626

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Dimple Sharma on June 10, 2020 at 11:56am

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी नमस्ते , ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, हौंसला अफ़ज़ाई के लिए हृदय तल से आभार! स्नेह बनाए रखें।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 8, 2020 at 7:32am

आ. डिम्पल जी, सादर अभिवादन ।अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Dimple Sharma on June 7, 2020 at 2:34pm

आदरणीय TEJ VEER SINGH जी नमस्ते, मेरी ग़ज़ल पर आपके विचार बहुत मायने रखते हैं बधाई हेतु धन्यवाद आभार, आशीर्वाद बनाए रखें।

Comment by TEJ VEER SINGH on June 7, 2020 at 9:09am

हार्दिक बधाई आदरणीय डिंपल शर्मा जी।अच्छी गज़ल।

गुलाबों में कांटे बहुत है ।
गुलाबों से मन भर रहा है ।।

ये मिट्टी नहीं थी हमारी ।
हमें कुछ बदलना पड़ा है ।।

Comment by Dimple Sharma on June 6, 2020 at 2:03pm

आदरणीय Rupam kumar 'मीत' जी हौंसला अफ़ज़ाई के लिए हृदय तल से शुक्रिया,धन्यवाद, आभार , स्नेह बनाए रखें।

Comment by Dimple Sharma on June 6, 2020 at 2:01pm

आदरणीय उस्ताद मोहतरम Samar Kabeer साहब आदाब कबूल करें, जी मैं इन गलतियों को आपके कहे अनुसार सुधार लुंगी , आपका बहुत बहुत धन्यवाद मार्गदर्शन के लिए , आपने तो मेरी ग़ज़ल में चार चाँद लगा दिए , आशीर्वाद बनाए रखें।

Comment by Samar kabeer on June 6, 2020 at 12:00pm

मुहतरमा डिम्पल शर्मा जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।

'हमें आग का डर नहीं था'

इस मिसरे को यूँ कहें तो गेयता बढ़ जाएगी:-

'नहीं है हमें आग का डर'

'सभी तो सभी से ख़फ़ा है'

इस मिसरे में रदीफ़ 'है' की बजाय "हैं" हो रही है,इस मिसरे को यूँ कर सकती हैं:-

'यहाँ हर बशर ही ख़फ़ा है'

'हमें रात लड़ना पड़ा था ।
उजाला बहुत ग़मज़दा है'

इस शैर के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,ऊला यूँ कर सकती हैं:-

'सबब क्या है मालूम कीजै'

'गुलाबों में कांटे बहुत है ।
गुलाबों से मन भर रहा है'

इस शैर के ऊला मिसरे में 'है' को "हैं" कर लें,और सानी मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर है,सानी यूँ कर लें तो ऐब निकल जायेगा:-

'गुलाबों से मन भर गया है'

Comment by Dimple Sharma on June 5, 2020 at 10:55pm

आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहब आपको भी अदब भरा प्रणाम आदाब सलाम , जी आपके मार्गदर्शन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आभार, मैं इसमें हुई त्रुटियों में अवश्य सुधार करुंगी और आपसे आगे भी मार्गदर्शन की ख्वाहिश रखूंगी !

कृपा दृष्टि बनाए रखें ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 5, 2020 at 9:12pm

मुहतरमा डिम्पल शर्मा जी, आदाब। छोटी बह्र में बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें, मगर ये शेअ'र रदीफ़ से बाहर है :

कहांँ है जहाँ में मुहब्बत ।        

सभी तो सभी से ख़फ़ा है । इस मिसरे को ऐसे कर सकते हैं: अभी तक वो मुझ से ख़फ़ा है। या : हर इक दूसरे से ख़फ़ा है। 

RSS

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post आदमी क्या आदमी को जानता है -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई रवि जी सादर अभिवादन। गजल पर आपकी उपस्थिति का संज्ञान देर से लेने के लिए क्षमा चाहता.हूँ।…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अशोक भाई, आपके प्रस्तुत प्रयास से मन मुग्ध है. मैं प्रति शे’र अपनी बात रखता…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना पर आपकी पाठकीय प्रतिक्रिया सुखद है, आदरणीय चेतन प्रकाश जी.  आपका हार्दिक धन्यवाद "
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय अशोक भाईजी "
Friday
Ashok Kumar Raktale posted blog posts
Friday
Chetan Prakash commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"नव वर्ष  की संक्रांति की घड़ी में वर्तमान की संवेदनहीनता और  सोच की जड़ता पर प्रहार करता…"
Friday
Sushil Sarna posted blog posts
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी । "
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय अशोक रक्ताले जी सृजन पर आपकी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का दिल से आभार । इंगित बिन्दु पर सहमत…"
Friday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजलपर उपस्थिति और सप्रेमं मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। इसे बेहतर…"
Thursday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service