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जब-जब ख़्वाब सुनहरे देखे - ग़ज़ल

सागर से भी गहरे देखे.

जब-जब ख़्वाब सुनहरे देखे.

 

नए दौर में नई सदी में,

साँसों पर भी पहरे देखे. 

 

गांधी जी के तीनों बंदर, 

अंधे गूँगे बहरे देखे.

 

अंदर कुछ थे बाहर से कुछ,

हमने जितने चेहरे देखे.

 

कुछ आँसू मरते आँखों में,

कुछ पलकों पर ठहरे देखे. 

 

नीड़ बनाते देखे पंछी,

पढ़ते नहीं ककहरे देखे

 

नीचे नंगी भूख बिलखती,

ऊपर झंडे फहरे देखे.

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 23, 2020 at 5:13pm

आदरणीय Rupam kumar -'मीत' जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसलाअफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 16, 2020 at 12:36pm

आदरणीय Nilesh Shevgaonkar जी सादर नमस्कार 

आपका सुझाव अनुकरणीय है , सादर स्वागत है 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 16, 2020 at 11:50am

आ. बसंत कुमार जी,

अच्छी ग़ज़ल हुई है .. बधाई स्वीकार करें.. 
मतले में रब्त कम है.. गहरे और सुनहरे में कोई तार्किक समानता नहीं नज़र आती ..
इसे यूँ कर के देखें..
"जब भी ख़ाब सुनहरे देखे 
सहरा जैसे ठहरे देखे..."
इस में धूप में तपती सुनहरी रेत और का सम्बन्ध भी है और काफ़िया भी..
यह सिर्फ आग्रह है.. ग़ज़ल के लिए पुन: बधाई  

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 16, 2020 at 11:47am

 आदरणीय Samar kabeer जी सादर नमस्कार-

अरे कोई बात नहीं , कभी कभी ऐसा हो जाता है, आपकी इस्लाह सदैव अनुकरणीय होती है और बहुत कुछ सीखने को मिलता है 

आपका स्नेह सदा मिलता रहे यही कामना है, सादर नमन आपको 

Comment by Samar kabeer on October 15, 2020 at 9:08pm

मुआफ़ कीजियेगा नज़र कमज़ोर है रदीफ़ देखे की जगह देखो हो गई, आपका मतला जैसा है वैसा ही रखें ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 15, 2020 at 5:57pm

आदरणीय Samar kabeer जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसलाअफजाई एवं तरमीम का दिल से शुक्रिया 

आपका सुझाव तो बहुत अच्छा है लेकिन अन्य अशआर में निभ नहीं रहा है 

'जब तुम ख़्वाब सुनहरे देखो'

शायद 

'सागर से भी गहरे देखे.

जितने ख़्वाब सुनहरे देखे' या 

जो-जो ख़्वाब सुनहरे देखे' किया जा सकता है 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 15, 2020 at 5:54pm

आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसलाअफजाई एवं तरमीम का दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 15, 2020 at 5:53pm

आदरणीय Deepalee Thakur जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसलाअफजाई का दिल से शुक्रिया 

Comment by Samar kabeer on October 15, 2020 at 3:44pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'सागर से भी गहरे देखे.

जब-जब ख़्वाब सुनहरे देखे'

मतले के दोनों मिसरो में रब्त की कमी नहीं,हाँ इसे और साफ़ करने के लिये सानी यूँ किया जा सकता है:-

'जब तुम ख़्वाब सुनहरे देखो'

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 14, 2020 at 8:06pm

आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी आदाब, बहतरीन ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ, बस मतले में जब-जब की वजह से रब्त टूट रहा है, जब-जब की जगह जितने करने से रब्त क़ायम हो सकता है। सादर। 

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