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प्रश्न ......

प्रश्न प्रश्न प्रश्न
स्वयं को तलाशते
सैंकड़ों प्रश्न

क्या मैं
सदियों से वीरान किसी पूजा गृह की
काल धूल के आवरण से लिपटी
कोई खंडित प्रतिमा हूँ

या फिर
किसी हवन कुंड में
किसी मनोरथ की सिद्धि के लिए
झोंकी जाने वाली सामग्री हूँ

या फिर
विषधरों के दंश झेलता
कोई चंदन का विटप हूँ

या फिर
काल की आँधी में अपने अस्तित्व से जूझता
धीरे-धीरे विघटित होता
शिला खंड हूँ

या फिर
यथार्थ और आभास के मध्य
अपने अस्तित्व के क्षितिज को तलाशता
एक असहाय शून्य हूँ

प्रश्न सैंकड़ों और
उत्तर
प्रश्नों की बलिवेदी पर 

सिर्फ़ शून्य छोड़ जाते हैं 

और मन फिर उलझ जाता है 

मैं कौन हूँ की प्रश्न दीर्घा में 

सुशील सरना 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 580

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Comment by Sushil Sarna on August 7, 2021 at 12:55pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है सर
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 7, 2021 at 5:30am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। अच्छी कविता हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by Sushil Sarna on July 29, 2021 at 9:40pm
आदरणीय चेतन प्रकाश जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से सम्मानित करने का दिल से आभार सर
Comment by Sushil Sarna on July 29, 2021 at 9:40pm
आदरणीय समर कबीर साहब, आदाब - सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है सर
Comment by Samar kabeer on July 26, 2021 at 8:37pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी कविता हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Chetan Prakash on July 26, 2021 at 7:53pm

 नमन,  सुशील  सरना  साहब,  अंतस की विवरणिका  है, आदरणीय आप की  कविता ! अच्छी लगी, सनातन प्रश्न का जवाब  खोजती  यह प्रस्तुति  !

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