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ग़ज़ल - इक अधूरी 'आरज़ू' को उम्र भर रहने दिया

वज़्न -2122 2122 2122 212

ख़ुद को उनकी बेरुख़ी से बे- ख़बर रहने दिया
उम्र भर दिल में उन्हीं का मुस्तक़र* रहने दिया (ठिकाना)

उनकी नज़रों में ज़बर होने की ख़्वाहिश दिल में ले
हमने ख़ुद को ज़ेर उनको पेशतर रहने दिया

उम्र का तन्हा सफ़र हमने किया यूँ शादमाँ
उनकी यादों को ही अपना हमसफ़र रहने दिया

उनसे मिलकर जो कभी होती थी इस दिल को नसीब
अपने ख़्वाबों को उसी राहत का घर रहने दिया

वो न आएँगे शब- ए- फ़ुर्क़त में ये तय था मगर
इक ख़याल- ए- क़ुर्ब हमने ता- सहर रहने दिया

ज़िंदगी की मुश्किलें आसान करने के लिए
शुक्र है तूने ख़ुदा मुझ में हुनर रहने दिया

ना-मुकम्मल शय किसे अच्छी लगीं हम ने मगर
इक अधूरी 'आरज़ू' को उम्र भर रहने दिया

-©अंजुमन 'आरज़ू' 

स्वरचित एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 7, 2021 at 5:03am

आ. अंजुमन जी, अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा है। हार्दिक बधाई। गुणीजनो की बातों का संज्ञान लें ।

और अन्य लेखकों की रचनाओं पर भी उपस्थिति दर्ज कराएँ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 2, 2021 at 4:46pm

बढ़िया ग़ज़ल कही आदरणीया...बधाई

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 19, 2021 at 10:00pm

मुहतरमा आरज़ू अंजुमन साहिबा आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है बधाई स्वीकार करें।

मतले के शिल्प में तकनीकी गड़बड़ है।

'ख़ुद को उनकी बेरुख़ी से बे- ख़बर रहने दिया  ...कैसे ? आप तो जान रहे हैं कि वो ख़फ़ा हैं! तो आप बेख़बर कैसे हुए? अगर आप कहते कि-

उन को अपनी बेरुख़ी से बे- ख़बर रहने दिया   तो ये मुमकिन है... लेकिन अगर ऊला ऐसे कहेंगे तो सानी मिसरे में कही गई बात ग़लत होगी 

उम्र भर दिल में उन्हीं का मुस्तक़र रहने दिया'  ...मुश्किल है, क्योंकि आप तो ख़फ़ा हैं। :-)) 

'उनकी नज़रों में ज़बर होने की ख़्वाहिश दिल में ले

  हमने ख़ुद को ज़ेर उनको पेशतर रहने दिया'.       इस शे'र पर मुहतरम समर कबीर साहिब से सहमत हूँ। 'नज़रों में ज़बर' मुख़ालिफ़ैन के होना ठीक है मगर महबूब की नजरों को भाने और लुभाने की बात सही है। मिसरा सानी में ज़ेर के साथ पेशतर का नहीं, ज़बर का जवाज़ है। 

'शुक्र है तूने ख़ुदा मुझ में हुनर रहने दिया'     इस मिसरे का शिल्प ठीक नहीं है, ग़ौर फ़रमाएं 'हुनर रहने दिया' ? 

मक़्ता, तीसरा और पाँचवा  शे'र उम्दा हुए हैं।  सादर। 

Comment by Samar kabeer on October 19, 2021 at 7:45pm

मुहतरमा अंजुमन `आरज़ू ` जी आदाब , ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है बधाई स्वीकार करें I 

उनकी नज़रों में ज़बर होने की ख़्वाहिश दिल में ले
हमने ख़ुद को ज़ेर उनको पेशतर रहने दिया-ये शे`र मुझे भर्ती का लगा I 

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