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दोहा त्रयी- सागर

दोहा त्रयी : सागर

सागर से बादल चला, लेकर खारा नीर ।
धरती को लौटा रहा, मृदु बूँदों का क्षीर ।।

जाने कितनी वेदना, बिखरी सागर तीर ।
पीते -पीते हो गया , खारा उसका नीर ।।

लहरों से गीले सदा, रहते सागर तीर ।
बन कर कितने ही मिटे, यहाँ स्वप्न प्राचीर ।।

सुशील सरना / 31-10-22

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Sushil Sarna on November 12, 2022 at 12:47pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी ।
Comment by Sushil Sarna on November 12, 2022 at 12:46pm
आदरणीय अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी ।
Comment by Sushil Sarna on November 12, 2022 at 12:45pm
आदरणीय समर कबीर जी आदाब सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 9, 2022 at 6:08pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। दोहे उत्तम रचे हैं। हार्दिक बधाई स्वीकारें।

Comment by Ashok Kumar Raktale on November 8, 2022 at 8:11am

आदरणीय सुशील सरना साहब सादर, तीनों ही दोहे उत्तम रचे हैं आपने. हार्दिक बधाई स्वीकारें. सादर

Comment by Mahendra Kumar on November 7, 2022 at 7:39pm

आदरणीय सुशील सरना जी, इस बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी से सहमत हूँ।

Comment by Sushil Sarna on November 7, 2022 at 2:51pm
आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सादर प्रणाम सर - सृजन के भावों को मान देने एवं अपना अमूल्य सुझाव देने के लिए दिल से आभार आदरणीय । मैं इस पर अवश्य प्रयास करूँगा । सादर नमन सर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 6, 2022 at 9:21pm

आदरणीय सुशील सरना जी. 

प्रस्तुति, दोहा त्रयी, का तीसरा दोहा अर्थबोध के निकष पर तनिक और समय की मांग करता प्रतीत हो रहा है. 
प्रयास के लिए हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें. 

शुभ-शुभ

 

Comment by Sushil Sarna on November 6, 2022 at 1:20pm
आदरणीय समर कबीर जी आदाब, सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है सर
Comment by Samar kabeer on November 5, 2022 at 6:51pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी प्रस्तुति  है, बधाई स्वीकार करें I 

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