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ग़ज़ल....उदास हैं कितने - बृजेश कुमार 'ब्रज'

बह्र-ए-मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
1212  1122  1212  112/22 

 

किसे जगा के बताएं उदास हैं कितने
सितारे,चाँद, हवाएं  उदास  हैं कितने

न कोई आह लबों पे न ही सदा कोई
ख़मोश रात  बिताएं उदास  हैं कितने

सुदूर सरहदों पे इक ग़ज़ल सिसकती है
ख़ुशी के गीत न गाएं, उदास  हैं कितने

 
क़ज़ा खड़ी है यहीं सामने शिफ़ा लेकर
हमीं न दार पे  जाएं, उदास हैं कितने

रखो न ज़ेहन को अय जान कर्ब-आलूदा
न कर्ब-ज़ा ही दिखाएं, उदास हैं कितने

मुझे न बख़्श सकेगा सुकूत-ए-दिल मेरा
भले  ही जान से जाएं, उदास हैं कितने

मुझे पता है भली-भाँति ढब उदासी का
मुझे न आप बताएं  उदास  हैं कितने

रुका न रोकने से 'ब्रज' उदासियों में कोई
जो जा रहे हैं वो जाएं ,उदास हैं कितने

क़ज़ा-मृत्यु,

शिफ़ा-दवा
दार-फाँसी का तख्ता
कर्ब-आलूदा-दुख से भरा हुआ
कर्ब-ज़ा-बेचैनी
सुकूत-ए-दिल-हृदय का सन्नाटा

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज' 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 7, 2025 at 12:56pm

ओबीओ का मेल चेक करें 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 7, 2025 at 12:40pm

आदरणीय सौरभ सर सादर नमन....दोष तो दोष है उसे स्वीकारने और सुधारने में कोई संकोच नहीं है। 

माफ़ी के साथ कहना चाहूँगा कि मेल सिर्फ पोस्ट एप्रूवल का ही मिला ।
कुछ सुधार का प्रयास करता हूँ...सादर 

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 7, 2025 at 12:28pm

भाई बृजेश जी, आपको ओबीओ के मेल के जरिये इस व्याकरण सम्बन्धी दोष के प्रति अगाह किया था. लेकिन ऐसा लगता है आपने मेल देखा ही नहीं होगा. 

प्रयासरत रहें 

शुभ-शुभ

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 7, 2025 at 11:14am

आदरणीय धामी जी स्नेहिल सलाह के लिए आपका अभिनन्दन और आभार....आपकी सलाह को ध्यान में रखते हुए जल्द ही कुछ सुधार का प्रयास करूँगा।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 7, 2025 at 11:12am

आदरणीय गिरिराज जी उत्साहवर्धन के लिए आपका बहुत-बहुत आभार और नमन करता हूँ...आपसे आदरणीय नीलेश जी आदरणीय धामी जी से पूर्णतया सहमत हूँ बस थोड़ी उत्सुकता है जिसे पहले कमेंट में लिखा है। 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 7, 2025 at 11:00am

आदरणीय नीलेश जी सर्व प्रथम रचना पटल पे उपस्थिति के लिए आपका हार्दिक आभार....वैसे ये दोष इतना बारीक़ नहीं है कि नज़र न पड़े लेकिन सच यही है कि आपके इंगित करने पे ही ध्यान में आया। 

ये साफ तौर से मेरी लापरवाही है उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ पटल से क्योंकि इतने समय बाद स्त्रीलिंग-पुल्लिंग का ध्यान तो होना ही चाहिए। 
इसे सुधारा जा सकता है लेकिन अब कुछ उत्सुकता है जैसे 'स्त्रीलिंग' के लिए 'कितनी' और 'पुल्लिंग' के लिए 'कितना' का प्रयोग होता है तो क्या 'स्त्रीलिंग हो या पुल्लिंग' के बहुवचन के लिए 'कितने' का प्रयोग नहीं किया जा सकता ?
जबकि 'मतले में 'रात' एकवचन और 'हवाएं' बहुवचन का प्रयोग हुआ है।
मेरी उत्सुकता को मैं ठीक से कह नहीं पा रहा ....
जैसे हम अपने किसी 'बड़े' को सम्मान की दृष्टि से सम्बोधन में बहुवचन का प्रयोग करते हैं...कुछ ऐसा शायद....
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 6, 2025 at 4:35pm

आ. भाई वृजेश जी, अभिवादन। अच्छी गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

मतले में यदि उन्हें सम्बोधित कर रहे हैं तो "हवाओ" करने से दोष हट जायेगा। यदि इनके उदास होने की बात कर रहे हैं तो जैसे गुणीजन कह रहे हैं क्रिया में लिंग दोष आ रहा है देखिएगा।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 6, 2025 at 3:11pm

अनुज बृजेश , पूरी ग़ज़ल बहुत खूबसूरत हुई है , हार्दिक बधाई स्वीकार करें 
मतले के उला में मुझे भी संदेह है , लिंग दोष का , आप गुनिजन का इन्तिज़ार कर सकते हैं 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 6, 2025 at 12:39pm

आ. बृजेश ब्रज जी,

अच्छी ग़ज़ल हुई है. बधाई स्वीकार करें.
मतले के ऊला में 
ये सर्द रात, हवाएं  उदास  हैं कितने रात और हवा दोनों स्त्रीलिंगी हैं अत: उदास हैं कितनीं आना चाहिए शायद.
शेष शुभ 
सादर 

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