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गमन पे उसके एक आवाज़ लगाई न गई |
हाय ये व्यथा, ये कथा जो सुनाई न गई||

लौट जाती वो, मुझे था यकीं, इस बात का भी|
हाय मज़बूरी,ज़बां पे बात ही लाई न गई||

पलों के साथ में कई सदियाँ जी लीं हमने|
एक छोटी बात की अलख, हमसे जगाई न गई||

कह दूँ मैं तो कहीं रुसवा न मुझसे हो बैठे|
ह्रदय की बात मुझसे, उसको बताई न गई||

अब तो मुझसे दूर, बहुत दूर जा चुकी है वो|
'दाग' पर याद की लगी ऐसी की मिटाई न गई||

आशीष यादव "राजा रुपर्शुखम"

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Comment by Rash Bihari Ravi on August 23, 2010 at 1:56pm
khubsurat

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 20, 2010 at 5:53am
Ashish ji shukriya spasht karane ke liye. asal me comma ke karan sanshay ki sthiti thi ,,,abhi door ho gai.
Comment by आशीष यादव on August 19, 2010 at 10:59pm
raana pratap जी आपको प्रणाम और धन्यवाद की आपने मेरे ग़ज़ल की तारीफ़ की| मई आप का भ्रम दूर करने कोशिश करता हूँ|
यहाँ मेरा विचार यही है की उसकी याद एक दाग के सामान न मिटने वाली है, यानी हर वक्त वो याद आती है|

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 19, 2010 at 8:13pm
प्रयास अच्छा है और तारीफ के काबिल है| अंतिम शेर के दूसरे मिसरे में "'दाग' पर याद" का आशय समझ में नहीं आया .....'दाग' शब्द कुछ भ्रम की स्थिति पैदा कर रहा है...स्पष्ट करे तो बेहतर|

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 19, 2010 at 9:35am
बढ़िया प्रयास है आशीष जी, अच्छा लिख रहे है, फ्लो बनाये रहे , धन्यवाद,

कृपया ध्यान दे...

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