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डिग्री और दुनियाँ

एक दिन मै अकेले बैठा था, वीरान जगह, सुनसान जगह|
और सोच रहा था ये दुनिया आखिर किस चीज से चलती है||

याद आया दिन कालेज का तब, मार पड़ी थी जब मुझको|
ये बता न पाया था  धरती, डिग्री पे झुक के चलती है||

मुझे मार पड़ी थी उस दिन भी, घंटा गणित का था शायद|
कुछ डिग्री कोण न बना सका, ये बात अभी तक खलती है||

इक चंचल चितवन की लड़की, जो प्यार मुझी से करती थी|
जब फेल हुआ तो कहन लगी, किसी और को पकड़ो वो चलती है||

इस गम ने मुझे झकझोर दिया, टूटे दिल के संग चला|
सुन रखा था टूटे दिल की दुनिया, पैमाने से चलती है||

देशी शराब के ठेके पर, पहुंचा मैं पीने की खातिर|
विक्रेता मुझसे पूछ लिया, "कहो कौन सी डिग्री चलती है"||

कुछ पैसों खातिर पहुंचा मै भी किसी कंपनी में|
तब इंटरव्यूवर पूछ लिया, "कोई पास तुम्हारे डिग्री है"||

काम दिहाड़ी दे दूंगा, खाकर वो तरस मुझपे बोला|
और कहने लगा कि "ऐ बेटे दुनिया डिग्री से चलती है"||

अब जाके मै समझा हूँ, दुनिया डिग्री से चलती है||

Views: 530

Comment

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Comment by Ajay Singh on November 3, 2010 at 9:55am
apki poetry k lye word hi nhi ml rhe bhai
Comment by sandeep kumaar kushwaha on September 4, 2010 at 7:12pm
bahut badhiya likhali sir ji
Comment by आशीष यादव on August 25, 2010 at 6:30am
Sabko pranam,
rachana sarahna ke liye dhanyawaad. Aap log aage bhi mera sath denge mai asha karta hu.
Comment by Rash Bihari Ravi on August 23, 2010 at 1:55pm
lajabab subsurat
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on August 23, 2010 at 1:31pm
देशी शराब के ठेके पर, पहुंचा मैं पिने की खातिर|
विक्रेता मुझसे पूछ लिया, "कहो कौन सी डिग्री चलती है"||

किसी कंपनी में गया मैं, एक अच्छे जॉब की खातिर|
इंटरव्यूवर मुझसे पूछ बैठा, "कोई पास तुम्हारे डिग्री है"||

वाह आशीष भाई वाह....ये अचानक से इतना दर्द कैसा निकल पड़ा...
वैसे बहुत सही रचना है पढ़ के हसी भी आ रही है...लेकिन जो भी हो रचना बहुत ही सुंदर ढंग से सजाया गया है....
Comment by Harsh Vardhan Harsh on August 23, 2010 at 9:21am
डिग्री को पूरे 360 डिग्री पर घुमाने के लिए बधाई।
Comment by baban pandey on August 22, 2010 at 10:29pm
बहुत ही अच्छा शीर्षक के साथ ...आशीष जी ..मजदूर क्या जाने डिग्री ...और हम भी ..जब पेट भूखे हो ...बधाई

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 22, 2010 at 8:03pm
देशी शराब के ठेके पर, पहुंचा मैं पिने की खातिर|
विक्रेता मुझसे पूछ लिया, "कहो कौन सी डिग्री चलती है"|
ha हा हा bahut खूब आशीष भाई इस डिग्री का प्रयोग इतने तरीको से हो सकती है, मैने सोचा नहीं था, बहुत खूब , अच्छी रचना , धन्यवाद,

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