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मेरा मन और मुस्कान

मेरे भीतर एक आकाश

कई सूर्य ,कई चन्द्र ,कई आकाशगंगाएं

तारों की झिलमिलाहट

उष्णता, शीतलता, धवलता,  कलुषता भी

संवेग, आवेग, आवेश का फैलाव

तो

प्यार, प्रेम, सुख और 

आनंद की लहर भी अंदर

इस आकाश से रूबरू होने की

कोशिश में लगी हूँ

बीत रहा है जीवन दौड़ते भागते

और

जीवन की इस दौड़ में

धीरे-धीरे सब खुल रहे हैं

सामने आ रहे हैं

एक दूसरे पर

हावी भी हो रहे हैं

कौन जीतेगा ?

मैनें मन को कहा

धीरे से,

दुलार से,

बस एक मुस्कान !

पिघल जायेंगें सब

शांत  हो जायेंगें

जीत जाएगा जीवन |

 

--मोहिनी चोरडिया

 

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Comment

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Comment by mohinichordia on December 28, 2011 at 10:20am

 आप सबका आभार 


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Comment by Saurabh Pandey on December 26, 2011 at 1:54pm

जीवन के शाश्वत प्रारूप को समझाती इस अच्छी रचना के लिये बधाइयाँ . 

Comment by LOON KARAN CHHAJER on December 25, 2011 at 5:00pm

आपकी कविता को मे
थार एक्सप्रेस मे प्रकाशित करके हज़ारों पाठकों तक पहुँचने का प्रयास का रहा हूँ . आपको एतराज हो तो सुघित करें.
 lkchhajer@gmail.com

Comment by Abhinav Arun on December 23, 2011 at 8:52am

अपने मनोभावों को बखूबी व्यक्त किया है रचनाकार ने हार्दिक बधाई !!

Comment by Mukesh Kumar Saxena on December 22, 2011 at 2:52pm
man ko na dekha ja sakta hai na suna ja sakata hai magar man me kya 2 chhupa ho sakta hai aap se jana vahut achchha likha hai

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