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तोड़ना जीस्त का हासिल समझ लिया होगा

तोड़ना जीस्त का हासिल समझ लिया होगा
आइने को भी मेरा दिल समझ लिया होगा

जाने क्यूँ डूबने वाले की नज़र थी तुम पर
उसने शायद तुम्हे साहिल समझ लिया होगा

चीख उठे वो अँधेरे में होश खो बैठे
अपनी परछाई को कातिल समझ लिया होगा

यूँ भी देता है अजनबी को आसरा कोई
जान पहचान के काबिल समझ लिया होगा

हर ख़ुशी लौट गई आप की तरह दर से
दिल को उजड़ी हुई महफ़िल समझ लिया होगा

ऐ तपिश तेरी ग़ज़ल को वो ख़त समझते हैं
खुद को हर लफ्ज़ में शामिल समझ लिया होगा
मेरे काव्य संग्रह ---कनक ---से

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Comment

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Comment by jagdishtapish on September 16, 2010 at 4:28pm
manniya saurabh ji
housla afjai ke liye hradya se aabhari hain ham aapke
wakai bahut gahri soch hai aapki --hamari rachna se bhi adhik achchi lagi aapki panktiyanरज्ज्वाँ भुजङ्गमिव प्रतिभासितं वै--punah punah aabhar aapka --saadar

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 16, 2010 at 2:26pm
यूँ भी देता है अजनबी को आसरा कोई
जान पहचान के काबिल समझ लिया होगा
एकाकी जीवन की व्यथा याफिर मिलने-जुलने की तड़प बेहतरीन ढ़ंग से निखर कर आयी है.

चीख उठे वो अँधेरे में होश खो बैठे
अपनी परछाई को कातिल समझ लिया होगा
बहुत खूब.. बहुत खूब.. रज्ज्वाँ भुजङ्गमिव प्रतिभासितं वै.. बहुत खूब..तपिशजी.
Comment by jagdishtapish on September 16, 2010 at 9:53am
माननीय राना जी --गणेश जी आशीष जी
हौसला अफजाई के लिए ह्रदय से आभारी हैं हम आप सभी के ---सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on September 16, 2010 at 9:24am
बहुत खूब ...बहुत सुन्दर ग़ज़ल...हर शेर उम्दा है|

मै यकीनी तौर पर कह सकता हूँ की इस ग़ज़ल ने आपको मंच पर बहुत बार दाद दिलवाई होगी| बहुत बहुत धन्यवाद|

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 16, 2010 at 9:00am
यूँ भी देता है अजनबी को आसरा कोई
जान पहचान के काबिल समझ लिया होगा,
बहुत खूब कहा तपिश सर, स्वयम से सवाल करता शे'र वाकई खुबसूरत है , अच्छी ग़ज़ल निकाला है आपने, शुक्रिया .
Comment by आशीष यादव on September 15, 2010 at 11:49pm
tapish ji pranaam,
bahut achchhi ghazal kahi aapne.
जाने क्यूँ डूबने वाले की नज़र थी तुम पर
उसने शायद तुम्हे साहिल समझ लिया होगा
bahut achchhi lagi yah line.

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