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गज़ल........उनको हवा नाम दूँ जाने मैं क्या करूँ .............

गज़ल........उनको हवा नाम दूँ जाने मैं क्या करूँ .............

   वो दूर हैं आज यूँ जाने मैं क्या करूँ

  वो मूक हैं आज क्यूँ जाने मैं क्या करूँ

 

  इक बात पे रंज हैं लब चुप से हैं जरा

  किसके सहारे लिखूं जाने मैं क्या करूँ

 

  अब पूँछते हैं नज़ारे आकर के भला

  उनको हवा नाम दूँ जाने मैं क्या करूँ 

 

  संगीत थी , मेरे गीतों की परवाज़ थी

  यूँ आज बेसाज़ हूँ जाने मैं क्या करूँ

 

  हम बैठ तन्हा कभीं यादों में खोजते

  अब रोज आवाज़ दूँ जाने मैं क्या करूँ

 

*************************************************

             अतेंद्र कुमार सिंह 'रवि'

*************************************************

 


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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 26, 2012 at 8:49pm

भाई अतेन्द्र जी, आपकी ग़ज़ल के लिये हृदय से साधुवाद.

विशेष बधाई -

संगीत थी , मेरे गीतों की परवाज़ थी

यूँ आज बेसाज़ हूँ जाने मैं क्या करूँ

वाह ! बहुत सुन्दर !

काफ़िया पर ध्यान रखा है आपने !

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 26, 2012 at 6:29pm

sundar prastuti.

Comment by Rajendra Swarnkar on March 26, 2012 at 5:56pm

अतेन्द्र जी
अच्छी रचना है , अच्छा प्रयास … बधाई और आभार !

...और श्रेष्ठ सृजन के लिए शुभकामनाएं हैं !

Comment by Abhinav Arun on March 16, 2012 at 9:25pm

इक बात पे रंज हैं लब चुप से हैं जरा

  किसके सहारे लिखूं जाने मैं क्या करूँ

सुन्दर भावपूर्ण रचना श्री अतेन्द्र जी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं आपको !!


Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 16, 2012 at 3:28pm

हम बैठ तन्हा कभीं यादों में खोजते

  अब रोज आवाज़ दूँ जाने मैं क्या करूँ

sundar prastuti.

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