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लुटा के सब कुछ चुपके से तेरी बज्म में हैं आये 
 बच गया था जो राख में  तेरी अंजुमन में हैं लाये 
महका करते थे जो कहीं और क्यों आज यहाँ हैं आये 
मर चुका जब अहसास गुलजार हो चमन अब  न भाये 
जो खुद हो वेबफा उसे अब  वफ़ा  क्यों भाये 
मरने पे आशिक के लिए कफ़न  क्यों  लाये  
चाहत के किस्से  उसके मेरे अब पुराने हो गए 
थी बुलंद जो इमारतें अब खंडहर मकान हो गए 
उन्हें पास बुलाने की चाहत में कितने प्रेम गीत गाये
कटती  रही जिंदगी यूँ ही तनहा वो गुलशन में न आये 
उनकी याद में रो रो यों "प्रदीप " बर्बाद हो गये
मेरा न सही औरों के चमन तो गुलजार हो गये 

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 8, 2012 at 3:23pm

aadarniya bhrmar ji, saadar abhivadan.

yun hi likha tha aap ko pasand aaya, dhanyavaad.

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 8, 2012 at 12:19am

उन्हें पास बुलाने की चाहत में कितने प्रेम गीत गाये

कटती  रही जिंदगी यूँ ही तनहा वो गुलशन में न आये 
उनकी याद में रो रो यों "प्रदीप " बर्बाद हो गये
मेरा न सही औरों के चमन तो गुलजार हो गये 
आदरणीय कुशवाहा जी ..मर्म भरा सन्देश ....अपने लिए जिए तो क्या जिए तू जी ए दिल ज़माने के लिए ..आप की सब मुरादें पूर्ण हों 
जय श्री राधे 
भ्रमर ५  
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 3, 2012 at 2:37pm

aadarniya rajesh kumari, mahodaya ji, sadar abhivadan, lagta hai aapne meri pukar sun li hai. laga ki sher hai. honsla afjayee ke liye hardik abhar.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 3, 2012 at 2:02pm

जो खुद हो वेबफा उसे अब  वफ़ा  क्यों भाये 

मरने पे आशिक के लिए कफ़न  क्यों  लाये  
चाहत के किस्से  उसके मेरे अब पुराने हो गए 
थी बुलंद जो इमारतें अब खंडहर मकान हो गए ..ye sher to lajabaab hain
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 31, 2012 at 11:15pm

ADARNIYA ASHOK JI, SADAR ABHIVADAN.

AAPNE SARAHA . HIMMAT BADHI. DHANYVAD. 

Comment by Ashok Kumar Raktale on March 31, 2012 at 7:04pm

  चाहत के किस्से  उसके मेरे अब पुराने हो गए
   थी बुलंद जो इमारतें अब खंडहर मकान हो गए
वाह! क्या बात है प्रदीप जी सुन्दर रचना बधाई.

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