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तनहा खड़ा 

एक पेड़ हूँ मैं 

बरसों पहले 

नन्हा सा प्यारा बच्चा

पास के जंगल से 

मोहित हो मेरे रूप पर 

अपनी नन्ही बाँहों में भर 

घर मुझे ले आया था 

कोमल हाथों से अपने 

आंगन में मुझे बसाया था 

सोते जागते उठते बैठते 

पास मेरे मंडराता था 

सुबह शाम पानी देकर 

मन ही मन इठलाता था 

बच्चे खेलें साथ मिलकर 

उनसे मुझे बचाता था 

आँगन उसका इतना बड़ा था 

जैसे होता माँ का दिल 

रह न जाऊं कहीं  अकेला 

नित नए पेड़ लगाता था 

 साथ -साथ हम बड़े हुए 

कई साथी मुझको दिए 

अपना घर परिवार बढाया 

जीवन के हर सुख-दुःख में 

अपना साझीदार बनाया 

कल चक्र से सब बंधे हुए 

समय बीता हम जुदा हुए 

वो आज नहीं है 

पर अभी हूँ मैं 

अकेले में खड़ा 

एक पेड़ हूँ मैं 

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Comment

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 1, 2012 at 6:04pm

धन्यवाद आदरणीय उमा शंकर जी, सादर 

Comment by UMASHANKER MISHRA on May 31, 2012 at 10:19pm

बहुत बढिया प्रसंग पर बढ़िया चित्रण

एक पेड़ हूँ मै ........बहुत कुछ कह गई

Comment by Lata R.Ojha on April 11, 2012 at 8:35am

Waah..kitni sundar rachna ..

badhai aapko ..

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 6, 2012 at 10:04pm

बच्चे खेलें साथ मिलकर 

उनसे मुझे बचाता था 

आँगन उसका इतना बड़ा था 

जैसे होता माँ का दिल 

रह न जाऊं कहीं  अकेला 

नित नए पेड़ लगाता था 

प्रिय कुशवाहा जी यादें मन में बस जाती हैं और दर्द छलक कर आंसुओं के रूप में  ..सुन्दर रचना ....

जीवन के हर सुख-दुःख में 

अपना साझीदार बनाया 

कल चक्र से सब बंधे हुए 

समय बीता हम जुदा हुए 

जय श्री राधे 
भ्रमर ५ 


Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 3, 2012 at 12:54pm

snehi minu ji, sadar. 

abhi dard baaki hai. agla bhag jaldi hi prastut karunga. dhanyvad.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 3, 2012 at 12:48pm

aadarniya avinash ji, sadar abhivadan

aap jaese mahan vyaktitv ke hastakshar mile, mere man ki bagiya ke phool khile. sneh , marg darshan banaye rakhiye. dhanyavad.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 3, 2012 at 12:43pm

adarniy manoj ji, sadar.

aapke sundar kavyatmak bhav hradya se lagaye. apka sneh man ko prafullit kar gaya. hardik abhar.

Comment by minu jha on April 3, 2012 at 11:50am

बहुत सुंदर कुशवाहा जी

दर्द को बङी कुशलता से उकेरा है आपने

अति सुंदर

Comment by AVINASH S BAGDE on April 3, 2012 at 10:22am

वो आज नहीं है 

पर अभी हूँ मैं 

अकेले में खड़ा 

एक पेड़ हूँ मैं ....bhai wah! Pradeep ji pedo ki vastut: yahi manodasha hai....bahut hi sateek shabd-chitr khincha hai aapane.

Comment by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on April 2, 2012 at 10:52pm

समय बड़ा बलवान है बंधू,समय बड़ा बलवान|

कभी जगत इसके संग चलता,कभी अकेली जान|

कभी पूजता है पत्थर को,कभी स्वयं भगवान|

कभी कभी हैवानों में भी दिखते हैं इंसान|

समय बड़ा बलवान है बंधू समय बड़ा बलवान|

आदरणीय कुशवाहा जी आपकी सुन्दर सी रचना के लिए मेरी चंद पंक्तियाँ आपको सादर समर्पित है|

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