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बंजारा लोगो की कैसी भी हो किस्मत 

 देखी  है उनमे, गजब की हिम्मत  |
बेदखल महाराणा के काल से बनजारा 
घूमता ही  रहा है शहर शहर बेसहारा |
देख  सपरिवार बेसहारा - 
भरी सर्दी में भी, 
बच्चे रहते  नंगे बदन, 
नेता हो या  कुबेर, 
नहीं पसीजता उनका मन |
इश्वर की भी बड़ी गजब है  लीला 
बंजारा भी आखिर बड़ा  हठीला  |
-लक्ष्मण प्रसाद  लडीवाला,जयपुर

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 3, 2012 at 7:25pm
जवाहर लाल सिंघजी, प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहजी, 
रविंद्रनाथ जी साही और राजेज्श कुमारी जी आप सभी 
का हार्दिक आभार जो मेरे उत्साह वार्धन किया | यह 
घुम्मकड़ जाति, हमारे राजस्थान के लगभग सभी शहरों
में आज भी अपने पुराने स्वरुप में देखने को मिलती है |
इस पर लेख लिखने का प्रयास कर आपकी सेवा में प्रस्तुत 
करने का प्रयास करूंगा | 
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला,जयपुर .

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Comment by rajesh kumari on April 3, 2012 at 2:08pm

bilkul sahi chitran kiya hai banjaare apni hi duniya me mast rahte hain.bahut achcha likha.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 3, 2012 at 1:11pm

inka itihas purana hai, aap is par lekh dene ka kasht karen,jankari badhegi, sundar prastuti hetu badhai.aadarniy mahoday, sadar abhivadan ke sath.

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on April 3, 2012 at 7:41am

बहुत ही अच्छी रचना! बधाई!

कम से कम आप ने इन बंजारों की स्थिति को समझा!

कृपया ध्यान दे...

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