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माँ तुम्हारी वंदना में गुन गुनाना चाहते हैं .
आरती के दीप नूतन फिर सजाना चाहते हैं.

छल छलाती जाह्नवी अमृत परसने फिर लगे.
मोक्ष की अवधारणा का सच बताना चाहते हैं.

जल नहीं अमृत समझकर पान नित करते रहें.
फिर वही पावन धरोहर हम बनाना चाहते हैं.

तट तुम्हारे तीर्थ पावन क्यों बदल इतने गए.
फिर वही गौरव पुराना हम दिलाना चाहते हैं.

धन्य उद्गम धाम गोमुख धन्य हिम मंडित शिलाएं.
आस्था के बीज नूतन फिर उगाना चाहते हैं.

कामना है तप नया कोई भागीरथ कर सकें.
आज जनजन को यही अनुभव कराना चाहते हैं.


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Comment

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Comment by वीनस केसरी on April 23, 2012 at 2:52pm

आदरणीय दया शंकर जी आपको यहाँ देख कर अच्छा लगा
ग़ज़ल की सुन्दर कहन और शिल्पगत कसाव ने मुग्ध कर दिया

ह्रदय तल से बधाई स्वीकारें 

Comment by AVINASH S BAGDE on April 23, 2012 at 11:31am

तट तुम्हारे तीर्थ पावन क्यों बदल इतने गए.

फिर वही गौरव पुराना हम दिलाना चाहते हैं.....
सुन्दर आह्वान दयाशंकर पाण्डेय जी 

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 22, 2012 at 8:21pm

जल नहीं अमृत समझकर पान नित करते रहें.
फिर वही पावन धरोहर हम बनाना चाहते हैं.

आदरणीय भावना को शब्दों में क्रमबद्ध कर की गयी सुन्दर कामना. बधाई.

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 22, 2012 at 1:50pm

तट तुम्हारे तीर्थ पावन क्यों बदल इतने गए.
फिर वही गौरव पुराना हम दिलाना चाहते हैं.

धन्य उद्गम धाम गोमुख धन्य हिम मंडित शिलाएं.
आस्था के बीज नूतन फिर उगाना चाहते हैं.

कामना है तप नया कोई भागीरथ कर सकें.
आज जनजन को यही अनुभव कराना चाहते हैं.

बहुत सुन्दर आह्वान और कामना ..माँ गंगे सदा अमृतजल से जीवन देती रहें ..आओ इन्हें बचाएं 

भ्रमर ५ 



सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on April 22, 2012 at 1:34pm

आदरणीय दयाशंकर पाण्डेय जी आपका इस मंच पर होना हमारे लिए गौरव की बात है| एक सुन्दर कामना के साथ लिखी गई यह रचना  अपनी भावनाओं को संप्रेषित करने में पूरी तरह से सक्षम रही है|

ढेर सारी बधाइयां कबूल करें|

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 21, 2012 at 8:38pm

परमादरणीय दयाशंकरजी, आपको इलाहाबाद के मंच और गोष्ठियों में जब साक्षात् काव्य पाठ करते सुना तो मैं सही कहिये रोमांचित हो गया था.  सनातनी और पौराणिक बिम्बों को आप स्वर दे कर वर्त्तमान पीढ़ी के लिये बहुत कुछ दे रहे हैं. 

ग़ज़ल की बह्र को जिस संयत और विशिष्ट ढंग से आपने निभाया है तथा जिन भावों को आपकी प्रस्तुत ग़ज़ल संप्रेषित करती है वह अपने आप पर आश्वस्ति के भाव जगाना सिखाती है. 

आपकी सादर उपस्थिति मंच के लिये प्रभा है.

सादर

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 21, 2012 at 11:34am

तट तुम्हारे तीर्थ पावन क्यों बदल इतने गए.
फिर वही गौरव पुराना हम दिलाना चाहते हैं.

bahut sundar bhav, badhai mahoday.

Comment by MAHIMA SHREE on April 21, 2012 at 10:17am
धन्य उद्गम धाम गोमुख धन्य हिम मंडित शिलाएं.
आस्था के बीज नूतन फिर उगाना चाहते हैं....
हरेक पंक्तियाँ लाजवाब ...बधाई आपको

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 21, 2012 at 10:14am

कामना है तप नया कोई भागीरथ कर सकें.
आज जनजन को यही अनुभव कराना चाहते हैं.


आदरणीय दया शंकर पाण्डेय जी , खुबसूरत ख्याल के साथ अच्छी ग़ज़ल आपने कही है, दाद कुबूल करें |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 21, 2012 at 9:34am

तट तुम्हारे तीर्थ पावन क्यों बदल इतने गए.
फिर वही गौरव पुराना हम दिलाना चाहते हैं.

दया शंकर पाण्डेय जी जल प्रदूषण को इंगित करती आपकी यह अप्रतिम रचना बहुत भाई वो पहले जैसे पावन नदी तट और स्वच्छ जल अब कहाँ ....बहुत सुन्दर भाव 

कृपया ध्यान दे...

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