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बात इतनी बढ़ी के कहर हो गयी;

हमको बचपन में क़ैदे उमर हो गयी;

*

बात कानों में घुलती शहद की तरह,

रात ही रात में क्यूँ ज़हर हो गयी;

*

कब ये चंदा ढला, कब ये सूरज उगा,

रात आँखों में गुज़री, सहर हो गयी;

*

ज़ेर साया थी दुनिया ये मेरे मगर,

जाने कब ये इधर से उधर हो गयी;

*

मुझको इससे अधिक क्या ख़ुशी होगी अब,

जो लिखी थी ग़ज़ल बा-बहर हो गयी;        ---------------- :-)

*

अब तलक तो खुदा को न सजदा किया,

ये दुआ मेरी कैसे असर हो गयी;

*

बात बनते-बनाते चली आई पर,

आज इस मोड़ पर कुछ कसर हो गयी;

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Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on May 5, 2012 at 8:20pm

आदरणीय कुशवाहा जी,

आपका स्नेह और सम्मान सदैव ही बेहतर करने को प्रेरित करता है| आपका हार्दिक आभार!

Comment by Abhinav Arun on May 5, 2012 at 8:05pm

वाह वाहिद जी ग़ज़ल का हर शेर कामयाब जिंदाबाद कमाल बधाई आपको !!

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 5, 2012 at 4:52pm

स्नेही संदीप  जी, सादर 

मैं आज ye soch raha tha की aapke शेरों को गुणवत्ता के आधार पर (भाव के आधार पर, takniki का ज्ञान मुझे नहीं है) krambaddh karunga. पर सरे sher nambar निकले. बधाई. 
Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on May 5, 2012 at 11:16am

आदरणीय अग्रज योगराज जी,

अभी सीख रहा हूँ आप के कुशल दिशा निर्देशन में शीघ्र ही और निखार आ जाएगा ऐसा मुझे विश्वास है| सादर,


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 5, 2012 at 11:10am

भाई संदीप द्विवेदी जी, बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है - वाह. लेकिन भाई, मतले में "कहर" के साथ "उमर" काफिये की बंदिश वज्न के हिसाब से दुरुस्त नहीं है, ज़रा दोबारा नज़र-ए-सानी कर लें. बहरहाल इस बढ़िया कलाम के लिए मेरी बधाई स्वीकारें.

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on May 5, 2012 at 10:55am

आदरणीय सीमा जी, राजेश जी, महिमा जी एवं आदरणीय अविनाश जी, सौरभ जी एवं आशीष जी! मेरी हौसलाअफ़ज़ाई के लिए आप सभी विद्वतजनों के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ| :-))


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 4, 2012 at 11:05pm

भाई संदीप वाहिद जी, आपकी इस ग़ज़ल पर आपको दिल से मुबारकबाद.

इन शेर के लिये विशेष बधाई कुबूल कीजिये.

बात कानों में घुलती शहद की तरह,
रात ही रात में क्यूँ ज़हर हो गयी;

कब ये चंदा ढला, कब ये सूरज उगा,
रात आँखों में गुज़री, सहर हो गयी;

और .. जो लिखी थी ग़ज़ल बा-बह्र हो गयी ... . आपने सही कहा है कि बा-बह्र मिसरों का हो जाना कितना आह्लादकारी हुआ करता है. वर्ना इसके बिना मानों अच्छे-खासे सफ़री को खड़खड़िया गाड़ी पर बिठा देना. .. :-))))

Comment by आशीष यादव on May 4, 2012 at 6:39pm
बहुत अच्छी गजल। सारे शेर बहुत अच्छे लगे।
Comment by MAHIMA SHREE on May 4, 2012 at 4:31pm
अब तलक तो खुदा को न सजदा किया,

ये दुआ मेरी कैसे असर हो गयी;
बहुत बढ़िया वाहिद जी .. बधाई स्वीकार करें
Comment by AVINASH S BAGDE on May 4, 2012 at 10:38am

कब ये चंदा ढला, कब ये सूरज उगा,

रात आँखों में गुज़री, सहर हो गयी;

संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' ji....wah!

ज़ेर साया थी दुनिया ये मेरे मगर,

जाने कब ये इधर से उधर हो गयी;


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