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यह रचना मैंने करीब १०-११ साल  पहले लिखी थी और आज जब इस रचना को पढ़ती हूँ तो ऐसा लगता है मानो न तब कुछ बदला था न आज कुछ बदला है बस अगर कुछ बदला है तो इस पुरुष प्रधान समाज में तीर मारने वाले बदल गए है. ये रचना हमेशा मेरे मन के निकट रही है इसलिए आप सभी तक पहुंचा रही हूँ ----
"उड़ान"
मैं हूँ इक छोटी सी चिड़िया
मन चाहे इस खुले गगन में
जी भर ऊँची भरू उड़ान .
पर जब भी मन की आशा को
स्वयं सार्थक करती हूँ,
तभी अचानक कंही दूर से
एक भयंकर तूफां आकर
मेरे कोमल पंखों को
ज़हर भरा एक तीर मार कर
मुझको घायल कर जाता है.
देख के मैं अपने पंखों को
आहत हो बेबस रह जाती.
पर कुछ थोड़े समय बाद ही
नए जोश और उम्मीदों से 
इन पंखों को पुनः जोड़ती,
फिर मन को विश्वास दिलाती ,
और पुनः ये ख्वाहिश करती
इस सुन्दर से नील गगन में
जी भर ऊँची भरूं उड़ान .......
मोनिका जैन "dolly"

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Comment by Dr.Prachi Singh on May 9, 2012 at 4:19pm

Bahut sundar rachna... HARDIK BADHAAII

Jab tak aurat khud ko chidiya saamjhegee, usko pinjre men band kiya jaata rahegaa, pankhon ko katra jaata rahega.

The roots of male dominance in Indian society dates back to advent of agriculture..when man first tried to transfer his land to his own children. From that point man started to dominate and control only one lady , to take care of his children.

Since then this male dominance has taken so many forms... and is presented today in its worst extreme.

Your poem is wonderful...I also wrote poem once on same situation of a lady in mental, emotional, psycological traps of male dominance, entitled "PINJAR BAND PANCHEE". I will love to share it some day.

 

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on May 9, 2012 at 10:52am

इन पंखों को पुनः जोड़ती,
फिर मन को विश्वास दिलाती ,
और पुनः ये ख्वाहिश करती 
इस सुन्दर से नील गगन में 
जी भर ऊँची भरूं उड़ान .......

सुन्दर पंक्तियाँ, बधाई मोनिका जी.

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