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वो देखो सखी

फिर रक्ताभ हुआ  नील गगन 

बढ़ रही हिय की धड़कन

विदीर्ण हो रहा हैमेरा  मन  

बाँध  दो इन उखड़ी साँसों को ,

अपनी श्यामल अलकों से 

भींच लूँ कुछ भी ना देखूं

 मैं अपनी इन पलकों से  

झील के जल में भी देखो

लाल लहू की है  ललाई

कैसे तैर रही है देखो

म्रत्यु  दूत   की परछाई 

थाम लो मुझको बाहों में

जडवत हो रही हूँ मैं 

दे दो सहारा काँधे का

सुधबुध खो रही हूँ मै

क्या सखी तूने सुनी

अभी जो आवाज आई है 

क्या अरि ने विजय की

रणभेरी बजाई है ?

ना सखी सच ये आभास नहीं है 

क्यूँ तुझको विश्वास नहीं है 

यह कोई  रक्तार्श  नहीं है 

जल में नहीं कोई  रक्तरंजित साया 

ये तो हिलते दरख्तों की छाया 

सांझ ढले की लाली है ये 

संध्या की चुनर मतवाली है ये 

गगन को देखो पलकें उठाकर 

नभचर उड़ रहे कतारें बनाकर 

ध्यान से देखो अपनी ध्वजा है 

युद्ध विराम का बिगुल बजा है 

अब रणांगन से लौटेंगी खुशियाँ 

गले मिलेंगी हम सब सखियाँ 

बुझा दो जो हिय  में अगन जले  

चल सखी थाल सजाएं हम  

आ चल अब घर लौट चलें  

आ चल अब घर लौट चलें 

******

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 10, 2012 at 2:27pm

  

हार्दिक आभार हरीश भट जी 
Comment by Harish Bhatt on July 10, 2012 at 1:33pm

आदरणीय राजेश जी नमस्‍ते, सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 5, 2012 at 10:20am

उमाशंकर मिश्र जी आपके तारीफ़ के शब्दों ने मेरी लेखनी को स्फूर्ति प्रदान की हार्दिक रूप से आभारी हूँ 

Comment by UMASHANKER MISHRA on July 4, 2012 at 11:48pm

बहुत बढ़िया चित्रण आदरणीय राजेश कुमारी जी आपकी रचना और प्रकृति का  साथ आपकी कविताओं.में सौंदर्य भर देता है

पाठक को गहन चिंतन करने को बाध्य करती रचना

बधाई ..बहुत सुन्दर रचना


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 4, 2012 at 9:11pm

योगी सारस्वत जी बहुत बहुत शुक्रिया आपको मेरी रचना पसंद आई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 4, 2012 at 9:10pm

लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला जी बहुत बहुत हार्दिक आभार 

Comment by Yogi Saraswat on July 3, 2012 at 4:11pm

ना सखी सच ये आभास नहीं है 

क्यूँ तुझको विश्वास नहीं है 

यह कोई  रक्तार्श  नहीं है 

जल में नहीं कोई  रक्तरंजित साया 

ये तो हिलते दरख्तों की छाया 

सांझ ढले की लाली है ये 

संध्या की चुनर मतवाली है ये 

गगन को देखो पलकें उठाकर 

नभचर उड़ रहे कतारें बनाकर 

ध्यान से देखो अपनी ध्वजा है 

युद्ध विराम का बिगुल बजा है

बहुत बढ़िया शब्द और सुन्दर प्रस्तुति !

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 3, 2012 at 11:52am

क्या अरि ने विजय कीरणभेरी बजाई है ?बुझा दो जो हिय  में अगन जले,चल सखी थाल सजाएं हम,  आ चल अब घर लौट चलें,  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई  राजेश कुमारीजी   


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 3, 2012 at 9:12am

सौरभ जी आपका बहुत बहुत हार्दिक आभार आपको  मेरी रचना पसंद आई |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 2, 2012 at 10:51pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी,  किसी रणबाँकुरे की भार्या की हाँ-ना की कश्मकश को बहुत ही दिल से उकेरा है आपने.

बहुत खूब. सादर

कृपया ध्यान दे...

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