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वो देखो सखी

फिर रक्ताभ हुआ  नील गगन 

बढ़ रही हिय की धड़कन

विदीर्ण हो रहा हैमेरा  मन  

बाँध  दो इन उखड़ी साँसों को ,

अपनी श्यामल अलकों से 

भींच लूँ कुछ भी ना देखूं

 मैं अपनी इन पलकों से  

झील के जल में भी देखो

लाल लहू की है  ललाई

कैसे तैर रही है देखो

म्रत्यु  दूत   की परछाई 

थाम लो मुझको बाहों में

जडवत हो रही हूँ मैं 

दे दो सहारा काँधे का

सुधबुध खो रही हूँ मै

क्या सखी तूने सुनी

अभी जो आवाज आई है 

क्या अरि ने विजय की

रणभेरी बजाई है ?

ना सखी सच ये आभास नहीं है 

क्यूँ तुझको विश्वास नहीं है 

यह कोई  रक्तार्श  नहीं है 

जल में नहीं कोई  रक्तरंजित साया 

ये तो हिलते दरख्तों की छाया 

सांझ ढले की लाली है ये 

संध्या की चुनर मतवाली है ये 

गगन को देखो पलकें उठाकर 

नभचर उड़ रहे कतारें बनाकर 

ध्यान से देखो अपनी ध्वजा है 

युद्ध विराम का बिगुल बजा है 

अब रणांगन से लौटेंगी खुशियाँ 

गले मिलेंगी हम सब सखियाँ 

बुझा दो जो हिय  में अगन जले  

चल सखी थाल सजाएं हम  

आ चल अब घर लौट चलें  

आ चल अब घर लौट चलें 

******

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 2, 2012 at 7:26pm

हार्दिक आभार प्राची जी आप सही कह रही हैं कुछ दिन पहले ही एक बुक पढ़ रही थी उसकी कहानी से प्रेरित होकर ये रचना लिखी गई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 2, 2012 at 4:01pm

युद्धकाल में एक स्त्री के मन में घर कर चुके डर को बहुत खूबसूरत  बिम्बों के माध्यम से प्रस्तुत करने के लिए हार्दिक बधाई आ. राजेश जी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 2, 2012 at 1:20pm

हार्दिक आभार रेखा जी 

Comment by Rekha Joshi on July 2, 2012 at 1:11pm

बहुत खूब राज जी 

ध्यान से देखो अपनी ध्वजा है 

युद्ध विराम का बिगुल बजा है 

अब रणांगन से लौटेंगी खुशियाँ 

गले मिलेंगी हम सब सखियाँ ,बहत सुंदर ,बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 2, 2012 at 9:59am

कुमार गौरव  जी  हार्दिक  आभार आपका 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 2, 2012 at 9:58am

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल जी हार्डक आभार आपका 

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on July 2, 2012 at 9:26am

अब रणांगन से लौटेंगी खुशियाँ 

गले मिलेंगी हम सब सखियाँ 

sundar panktiyan.....badhai

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 1, 2012 at 10:57pm

युद्ध विराम का बिगुल बजा है 

अब रणांगन से लौटेंगी खुशियाँ 

गले मिलेंगी हम सब सखियाँ 

आदरणीया राजेश कुमारी जी  रणांगन  से हमेशा शुभ  संदेशा आये और हिय की अगन  शांत हो ....बहुत सुन्दर  रचना ..जय श्री राधे 

भ्रमर ५ 

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