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कब बदलोगे

कभी मस्जिद में ले चलना कभी मंदिर में आओ तुम
वहीँ से चर्च में चल देंगे मिलजुलकर हम और तुम
यह दर-ओ-दीवार मज़हव की कहीं आड़े न आ जाए
कहीं इंसानियत के फूल को कम्बखत खा जाए
बदलो सोच को अपनी झाँको दिल के बाहर भी
घटिया सोच के दायरे में कहीं हो जाएँ न हम गुम
यह मेरा दावा है गुरूद्वारे में भी राम बसते हैं
ज़रा तू मान ले यह बात दीपक 'कुल्लुवी' की भी सुन

दीपक कुल्लुवी
13 जून 2012 .
09350078399

Views: 419

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Comment by Deepak Sharma Kuluvi on July 19, 2012 at 5:41pm

HAM SABKO APNE ANTARMAN MEN JHANKNE KI ZAROORAT HAI..........

DHANYABAD

DEEPAK KULUVI

09350078399

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 18, 2012 at 11:41pm

यह दर-ओ-दीवार मज़हव की कहीं आड़े न आ जाए
कहीं इंसानियत के फूल को कम्बखत खा जाए
बदलो सोच को अपनी झाँको दिल के बाहर भी 
घटिया सोच के दायरे में कहीं हो जाएँ न हम गुम 

प्रिय दीपक जी ..बहुत सुन्दर सन्देश देती रचना ...आइये अपने अंतर्मन में झांके और हम कितने पानी में हैं कितने खरे इस पर आंकें 

जय साईं ..
भ्रमर ५ 

 

Comment by Deepak Sharma Kuluvi on July 16, 2012 at 10:01am

shukriya

Rekha Ji,Albela ji,patel ji.....for appriciating  my Kab Badloge..

Comment by Rekha Joshi on July 14, 2012 at 7:15pm

दीपक जी ,अति सुंदर रचना ,बहुत बहुत बधाई 

Comment by Albela Khatri on July 14, 2012 at 12:15pm

बहुत सुन्दर रचना  दीपक कुल्लुवी जी
बधाई आपको.......
जय हो !

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on July 14, 2012 at 11:15am

बहुत सच्ची बात कही है आपने
जिसकी सल्तनत तिनके तिनके में है उसे कहाँ ढूंढते भटकते हैं
खुद तो भटकते हैं दूसरों को भी भटकाते हैं
उसे तो जहां देखो वो ही वो है
उसके अतिरक्त है कौन
कोई भी नहीं
कोई भी नहीं

आपको सादर बधाई

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