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माहिया  (12,10,12)

(1)

अम्बर पे बदरी है

देखो आ जाओ 

तरसे मन गगरी है 

(२)

सागर में नाव चली 

बिन तेरे कुछ भी 

चीजें लगती न भली  

 (३)

 चुनरी पे  नौ बूटे 

सुन तकते- तकते 

कहीं डोरी  न  टूटे 

 (४)

सूरज सिन्दूरी  ना 

मिल न सके कोई   

इतनी भी दूरी ना 

(५)

मैं माँ घर जाउंगी 

 पैर पकड़ लेना

वापस नहीं आउंगी  

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 1, 2012 at 12:47pm

अरुन शर्मा जी बहुत बहुत आभार आपका 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 1, 2012 at 12:46pm

बहुत बहुत हार्दिक आभार प्रिय प्राची जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 1, 2012 at 12:45pm

हार्दिक आभार अलबेला जी आपको ख़ुशी हुई तो हमें भी हुई 

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 1, 2012 at 12:24pm

आदरेया राजेश कुमारी जी बेहद खुबसूरत माहिया, बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 1, 2012 at 11:49am
आदरणीया राजेश कुमारी जी,
बहुत सुन्दर, मधुर माहिया लिखने के लिए आपको हार्दिक बधाई.
इस लुप्तप्राय (अतः नयी प्रतीत होने वाली) पंजाबी लोक गीत विधा से अवगत कराने के लिए आपका आभार.
Comment by Albela Khatri on August 1, 2012 at 11:28am

waah waah waah

man khush ho gaya

badhaai


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 1, 2012 at 8:52am

हार्दिक आभार रक्तेला जी आपको ये प्रयास पसंद आया बहुत ख़ुशी हुई 

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 1, 2012 at 8:12am

राजेश कुमारी जी

                    सादर,

चुनरी पे  नौ बूटे 

सुन तकते- तकते 

कहीं डोरी  न  टूटे 

इस विधा पर पहली बार पढ़ रहा हूँ. माहिया  से पंजाबी का आभास हो ही रहा था आपने निचे विस्तार से बताया भी  है, बहुत सुन्दर कलारूप.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 31, 2012 at 5:23pm

हार्दिक आभार संजय हबीब जी आपको माहिया पसंद आया |यह एक बहुत पुरानी पंजाबी लोक गीतों से जुडी विधा है इसमें पति पत्नी या प्रेमी प्रेमिका की  आपसी छेडछाड चुहल बाजी से सम्बंधित शब्द होते थे शादी जैसे मोकों पर उत्सवों में प्रसिद्द होते थे किन्तु आज कल और विषय पर भी माहिया लिखे जाने लगे यह त्रिवेणी से मिलते जुलते हैं पहली और अंतिम पंक्ति तुकांत होती है और मात्राएँ १२,१०,१२ होती हैं|जितना मुझे पता है वो ही आपको सांझा कर रही हूँ बाकी योगराज जी जो पंजाबी भाषी हैं अच्छे से समझा सकते हैं  

Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on July 31, 2012 at 3:54pm

विधा नई, हम जाने

हाँ! अपना भी दिल 

बिना रचे नहिं माने

अच्छी भाव भरी रचनाओं के साथ एक सुन्दर विधा से परिचय कराया आपने आदरणीया राजेश कुमारी जी.... सादर बधाई स्वीकारें... पहली बार पढ़ रहा हूँ... 'माहिया' के सम्बन्ध में और भी जानने की इच्छा है...

सादर.

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