For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

गीत मे तू मीत मधुरिम नेह के आखर मिला

सौरभ जी से चर्चा के पश्चात जो परिवर्तन किये हैं उन्हें प्रस्तुत कर रही हूँ 

परिचर्चा के बिंदु सुरक्षित रह सके  इस हेतु  पूर्व की पंक्तियों को भी डिलीट नहीं किया है जिससे नयी पंक्तियाँ नीले text में हैं 

 

गीत मे तू मीत मधुरिम नेह के आखर मिला 
प्रीत के मुकुलित सुमन हो भाव मे भास्वर* मिला -----*सूर्य

हो सकल यह विश्व ही जिसके लिए परिवार सम 
नीर मे उसके नयन के स्नेह का सागर मिला 

पी लिया जिसने हलाहल बन के मीरा की तरह 
ऐसी भक्ति से स्वयं फिर आ के वो गिरधर मिला 

पी लिया जिसने हलाहल बन के मीरा बावरी 
प्रेम की  ऐसी ऊँचाई पर स्वयं ईश्वर मिला 

है सबल या है निबल मत सोच रेखा भाग्य की 
लक्ष्य बस उसको मिला जो कर्म मे तत्पर मिला 

है सबल या है निबल मत सोच रेखा भाग्य की 
लक्ष्य तो वो भेदता ,जो कर्म मे तत्पर मिला 

क्या गज़ल क्या गीत क्यों इस बात पर चर्चा करें 
जो हरें पीड़ा ह्रदय की तू वही अक्षर मिला 

ढूंढ के थक जाएगा काबा ओ काशी एक दिन 
वो है भीतर स्वयं के बाहर कहाँ ईश्वर मिला 

टूटते जिन स्वप्न को दरकार है आधार की
आ तू उनकी नींव मे विश्वास के पत्थर मिला 

कैद मे थे वक्त की जो कामनाओं के विहग 
उड़ चले जैसे ही बंधक आस को अम्बर मिला

Views: 1051

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by seema agrawal on September 12, 2012 at 5:59pm

बिलकुल सौरभ जी बल्कि कुछ ऐसा ही होना चाहिए था 

प्रेम से ऐसे स्वयं फिर आ के वो गिरधर मिला.........इन पंक्तियों को पूरा पढने के बाद ही अर्थ स्पष्ट हो पा रहा था मैं स्वयं  शंकित थी 

पर आप  ने  वो दुविधा दूर कर दी  :):):)

प्रेम की ऐसी ऊँचाई पर स्वयं गिरधर मिला ...वाह !!

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on September 12, 2012 at 5:55pm
चमत्कृत करने वाली गजल है आदरणीय सीमा दी!
एक बार दो बार तीन बार और बार बार गुनगनाता रहा।सात्विक अनुभूति सी हुई।लगा कविता स्वयं मूर्तिमान हो गई है।अलौकिक दिव्य और सत्वगुण युक्त है।कहन वहन पर मुझे कुछ नहीं कहना भाव में ही डूब रहा हूं।हार्दिक आभार।
Comment by Rekha Joshi on September 12, 2012 at 5:38pm

है सबल या है निबल मत सोच रेखा भाग्य की 
लक्ष्य बस उसको मिला जो कर्म मे तत्पर मिला ,अति सुंदर रचना आ सीमा जी ,हार्दिक बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 12, 2012 at 5:37pm

आपकी तार्किकता को उचित सम्मान दे रहा हूँ, सीमाजी. बहुत ही सुगढ़ प्रयास हो रहा है.

अब आपकी पंक्तियों पर --

पी लिया जिसने हलाहल बन के मीरा की तरह 
प्रेम से ऐसे स्वयं फिर आ के वो गिरधर मिला..

वाह वाह ! बहुत सुन्दर प्रयास हुआ है, आदरणीया सीमाजी.

क्या सानी को ऐसे भी अभिव्यक्त कर सकते हैं --

प्रेम की ऐसी ऊँचाई पर स्वयं गिरधर मिला

सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 12, 2012 at 5:07pm

हार्दिक बधाई आदरणीय सीमा अग्रवाल जी,

ख़ुशी है मधु गीत का आखर तुझे मिला 

सुदर भाव लड़ियों में पिरोने का यह सिलसिला 

यूँ ही चलता रहे चलता रहे आखिर छोर तक 

क्या गजल क्या गीत क्यों यह चर्चा करे 

हरे पीड़ा ह्रदय की,छंद काव्य मुझे पढने मिला |

Comment by seema agrawal on September 12, 2012 at 4:27pm

ओह !!!!  सौरभ जी आपके smilies 
पर  भक्तिन शब्द मुझे  ठीक नहीं लग रहा है क्योंकि मैंने यहाँ किसी स्त्री या पुरुष की भक्ति की बात नहीं की है.... मीरा प्रतीक रूप में हैं आस्था,विश्वास और प्रेम के और इन भावों को स्त्री या पुरुष के रूप में discriminate नहीं करना चाहती हूँ ...आपकी बहर की बात पर ध्यान देते हुए जो परिवर्तन किया है वो इस तरह है 

पी लिया जिसने हलाहल बन के मीरा की तरह 
प्रेम से ऐसे स्वयं फिर आ के वो गिरधर मिला..........

Comment by राजेश 'मृदु' on September 12, 2012 at 4:05pm

बहुत ही बढि़या रचना है, आपको मेरी ओर से ढेरों बधाईयां, सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 12, 2012 at 2:44pm

जी, सादर

Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 12, 2012 at 2:31pm

बिल्कुल सही कह रहे थे आप .......सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 12, 2012 at 2:23pm

आपने एकदम दुरुस्त फ़रमाया, आदरणीय अम्बरीष जी. मैं वस्तुतः इस बह्र (बहरे रमल मुसमन महजूफ़) की हरिगीतिका से किंचित साम्य की बात कर रहा था जो कि आखिरी रुक्न (रुक्ने ज़रब) को छोड़ कर उक्त छंद के समानान्तर चलती है.

सादर

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"बेटा,  व्तक्तिवाची नहीं"
53 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय दयाराम जी, रचनाकार का काम रचनाएँ प्रस्तुत करना है। पाठक-श्रोता-समीक्षक रचनओं में अपनी…"
6 hours ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आदरणीय सौरभ पांडेय जी, हर रचना से एक संदेश देने का प्रयास होता है। मुझे आपकी इस लघु कथा से कोई…"
8 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी।  आप उन शब्दों या पंक्तियों को…"
9 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई। एक दो जगह टंकण त्रुतियाँ रह…"
9 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"पत्थर पर उगती दूब ============ब्रह्मदत्तजी स्नान-ध्यान-पूजा आदि से निवृत हो कर अभी मुख्य कमरे में…"
20 hours ago
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"स्वागतम"
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीया रिचा यादव जी नमस्कार बहुत शुक्रिया हौसला अफ़ज़ाई का "
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"क्या गिला गर किसी को भूल गया इश्क़ में जो ख़ुदी को भूल गया अम्न का ख़्वाब देखा तो था पर क्या करुँ रात…"
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय तिलक राज कपूर जी नमस्कार बहुत- बहुत धन्यवाद आपका आपने समय निकाला ग़ज़ल तक आए और ऐसी बेहतरीन…"
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय अजय गुप्ता 'अजेय' जी नमस्कार बहुत धन्यवाद आपका आपने समय दिया आपने सहीह फ़रमाया गुणी…"
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक…"
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service