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पौधा रोपा परम-प्रेम का

पौधा रोपा परम-प्रेम का, पल-पल पौ पसरे पाताली |

पौ बारह काया की होती, लगी झूमने डाली डाली |

जब पादप की बढ़ी उंचाई, पर्वत ईर्ष्या से कुढ़ जाता -

टांग अडाने लगा रोज ही, बकती जिभ्या काली गाली |

लगी चाटने दीमक वह जड़, जिसने थी देखी गहराई -

जड़मति करता दुरमति से जय, पीट रहा आनंदित ताली |

सूख गया जब प्रेम वृक्ष तो, काट रहा जालिम सौदाई -

आज ताकता नंगा पर्वत, बिगड़ चुकी जब हालत-माली |

लगी खिसकने चट्टानें अब , भूमि स्खलित होती हरदम -

पर्वत की गरिमा पर धक्का, धिक्कारे जो दीमक पाली ।।

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 3, 2012 at 9:23pm

लगी खिसकने चट्टानें अब , भूमि स्खलित होती हरदम -
पर्वत की गरिमा पर धक्का, धिक्कारे जो दीमक पाली ।।

ऐसी दीमकों का बसेरा हर जगह है भाई रविकर जी.  बहुत अच्छी कविता है और सप्रवाह है.  बधाई.

Comment by रविकर on October 3, 2012 at 3:10pm

आभार आदरणीय ||

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on September 30, 2012 at 12:48am

सूख गया जब प्रेम वृक्ष तो, काट रहा जालिम सौदाई -

आज ताकता नंगा पर्वत, बिगड़ चुकी जब हालत-माली |

लगी खिसकने चट्टानें अब , भूमि स्खलित होती हरदम -

पर्वत की गरिमा पर धक्का, धिक्कारे जो दीमक पाली ।

आदरणीय रविकर जी  ..बहुत सुन्दर रचना ...खूबसूरत सन्देश ..और आज के समाज का चित्रण 

जय श्री राधे 
अपना स्नेह बनाये रखें 
भ्रमर ५ 

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 29, 2012 at 6:39pm

बहुत बढ़िया ,उत्कृष्ट रचना दुबारा पढ़ी उतनी ही अच्छी लगी बधाई आपको 

कृपया ध्यान दे...

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