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ऐ मेरे प्रांगण के राजा

क्यूँ तुम ऐसे मौन खड़े 

झंझावत जो सह जाते थे 

जीवन के वो बड़े बड़े 

क्यूँ तुम ऐसे मौन खड़े ?

बरसों से जो दो परिंदे 

इस कोतर में रहते थे 

दर्द अगर उनको  होता 

तेरे ही  अश्रु बहते थे 

उड़ गए वो तुझे छोड़ कर 

अपनी धुन पर अड़े अड़े

क्यूँ तुम ऐसे मौन खड़े ?

इस जीवन की रीत यही है 

सुर बिना संगीत यही है  

उनको इक दिन जाना था 

जीवन  धर्म निभाना था 

राजा जनक भी खड़े रह गए 

आंसू  नयन से झड़े झड़े 

क्यूँ तुम ऐसे मौन खड़े ?

इकला ही है आना- जाना 

चंद दिनों का है ठिकाना 

जीवन के इस रंग मंच पर 

आकर बस किरदार निभाना 

कुम्भकार की माटी जैसे 

बनते मिटते सभी घड़े 

क्यूँ तुम ऐसे मौन खड़े ?

**********************

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 11, 2012 at 9:02pm

आदरणीय अशोक कुमार रक्ताले जी आपको रचना पसंद आई उत्साह वर्धन हेतु बहुत बहुत आभार 

Comment by Ashok Kumar Raktale on October 11, 2012 at 7:49pm

ऐ मेरे प्रांगण के राजा

क्यूँ तुम ऐसे मौन खड़े 

झंझावत जो सह जाते थे 

जीवन के वो बड़े बड़े 

क्यूँ तुम ऐसे मौन खड़े ?

सुन्दर भावनात्मक रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें आद. राजेश कुमारी जी.

Comment by राज़ नवादवी on October 10, 2012 at 10:10pm

शुक्रिया आपका आदरणीया राजेश जी, //बात बस लिखते लिखते कह डाली, चाय पीते पीते ज्यूँ सिसकती है प्याली// सादर!  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 10, 2012 at 9:51pm

//रिश्ते ओ किर्दार कुछ ऐसे गुज़रते जाते हैं, मैं इक साकिन ज़मीं हूँ, अफ्लाक के अहाते हैं!//---वाह!! क्या बात कही है 

Comment by राज़ नवादवी on October 10, 2012 at 9:37pm

क्या बात है,

//दिलसे भी है पोशीदा मेरी डायरी, 

हाय संगीन-ओ-संजीदा मेरी डायरी //

सच कहा आपने, यादों के ताने बाने में ज़िंदगी के फ़साने को लिखा है हमने. जो कहा हमने वो न सुना आपने, जो न लिखा वो पढ़ा है आपने. 

//रिश्ते ओ किर्दार कुछ ऐसे गुज़रते जाते हैं, मैं इक साकिन ज़मीं हूँ, अफ्लाक के अहाते हैं!//

- राज़ नवादवी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 10, 2012 at 8:31pm

 राज़    नवद्वी जी हार्दिक आभार आपको रचना पसंद आई वास्तव में ये रचना बहुत पुरानी है आज कल में  ही मैं अपनी डायरी देख रही थी तो नजर पड़ गई इस रचना पर ये तब लिखी थी जब मेरी बेटी विवाह के बाद विदा हो गई थी और बेटा होस्टल लौट गया था अपने पति की आँखों में पहली बार आंसू देखे थे तब व्यथित मन से एक दिन लिखी थी 

Comment by राज़ नवादवी on October 10, 2012 at 8:20pm

//ऐ मेरे प्रांगण के राजा, क्यूँ तुम ऐसे मौन खड़े// वृक्ष को किया गया ये संबोधन बहुत ही पसंद आया, वैसे सम्पूर्ण रचना ही सुब्दर है, बधाई हो आदरणीया राजेश जी! 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 10, 2012 at 7:36pm

आदरणीय सौरभ जी ह्रदय से आभारी हूँ मेरी रचना को मान दिया आपने 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 10, 2012 at 5:58pm

कुम्भकार की माटी जैसे
बनते मिटते सभी घड़े

आदरणीया राजेश कुमारीजी, आपकी प्रस्तुत कविता में निहित भावों से हृदय भर गया.  हार्दिक बधाई स्वीकार करें.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 10, 2012 at 8:48am

आदरणीय रेखा जी आपको रचना पसंद आई हार्दिक धन्यवाद 

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