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चारागर की ख़ता नहीं कोई.
दर्दे-दिल की दवा नहीं कोई.

आप आये न मौसमे-गुल में,
इससे बढ़कर सज़ा नहीं कोई.

ग़म से भरपूर है किताबे-दिल,
ऐश का हाशिया नहीं कोई.

देख दुनिया को अच्छी नज़रों से,
सब भले हैं बुरा नहीं कोई.

सच का हामी है कौन पूछा तो,
वक़्त ने कह दिया नहीं कोई.

है सफ़र दश्ते-नाउम्मीदी का,
मौतेबर रहनुमा नहीं कोई.

अपने ही घर में हैं पराये हम,
बेग़रज़ राबता नहीं कोई.

इस तअ्‍‌फ्फ़ुनज़दा जहाँ में आज,
रूह अफ़ज़ा हवा नहीं कोई.

क्यों झुके सर ‘लतीफ़’ के आगे,
आदमी है ख़ुदा नहीं कोई.‌‍


©अब्दुल लतीफ़ ख़ान (दल्ली राजहरा).

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Comment

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Comment by Sonam Saini on November 2, 2012 at 4:09pm

khubsurat ghazal ................

Comment by सूबे सिंह सुजान on October 22, 2012 at 12:11am
bhut khoob
Comment by Abhinav Arun on October 21, 2012 at 11:48am

शानदार ग़ज़ल आदरणीय श्री अब्दुल जी - ये शेर ख़ास है -

अपने ही घर में हैं पराये हम,
बेग़रज़ राबता नहीं कोई.

वैसे हर शेर बाकमाल कहा है आपने बधाई !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 20, 2012 at 9:40am

किस एक शेर की कहूँ ? पूरी ग़ज़ल बहुत ही ऊँचे मेयार की है, लतीफ़ भाई.  दिल से दाद कुबूल फ़रमायें.

सच का हामी है कौन पूछा तो,
वक़्त ने कह दिया नहीं कोई.

वाह-वाह !

Comment by ajay sharma on October 19, 2012 at 10:29pm

चारागर की ख़ता नहीं कोई.
दर्दे-दिल की दवा नहीं कोई. wah mat ala very good

आप आये न मौसमे-गुल में,
इससे बढ़कर सज़ा नहीं कोई.   very good

ग़म से भरपूर है किताबे-दिल,
ऐश का हाशिया नहीं कोई.  wah wah wah sher

देख दुनिया को अच्छी नज़रों से,
सब भले हैं बुरा नहीं कोई.  bahut khoob kya baat hai really really good

सच का हामी है कौन पूछा तो,
वक़्त ने कह दिया नहीं कोई.    satirical ,,,,truly said 

है सफ़र दश्ते-नाउम्मीदी का,
मौतेबर रहनुमा नहीं कोई.       bahut kuch kah diya hai ---idealogy of today's leadership

अपने ही घर में हैं पराये हम,
बेग़रज़ राबता नहीं कोई.         bahut khoob sher hai zanab

इस तअ्‍‌फ्फ़ुनज़दा जहाँ में आज,
रूह अफ़ज़ा हवा नहीं कोई.       kafas me hai ye insaan ander to zyada hi pollution hai 

क्यों झुके सर ‘लतीफ़’ के आगे,
आदमी है ख़ुदा नहीं कोई.‌‍        kya baat hai khush kar diya dil 

 

Comment by सूबे सिंह सुजान on October 19, 2012 at 9:30pm

wah bhai i bhut khoob hai............


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 18, 2012 at 11:06am

इस लाजवाब ग़ज़ल के लिए ढेरों ढेर दाद पेश कर रहा हूँ अब्दुल लतीफ़ खान साहिब, कबूल फरमाएं.

Comment by वीनस केसरी on October 18, 2012 at 12:28am

वाह लतीफ़ साहिब वाह

वाह वाह वा
बस हुजूर
वाह और वाह

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