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ग़ज़ल :दो कदम ही सही साथ,चलकर के देखों.

दो कदम ही सही साथ,चलकर के देखों.
हम गरीबों की हालात, चलकर के देखों.

ऊँचे महलों से बारिस का मज़ा लेनेवालों,
तंग गलियों की बरसात,चलकर के देखों.

संसद के सोफे क्या समझेगे गावों का मर्म,
बेबस जनता की मुश्किलात,चलकर के देखों.

सुहागन से सदा बेवा का दर्द जाननेवालों,
कभी बिरह में एक रात, जलकर के देखों.

झूठे कसमों से इन्तखाब जीत जानेवालों,
छली जनता का जज्बात,चलकर के देखों.

ऐशों-आराम तय करते है मुकद्दर किल्लतों का,
सता से बाहर अपनी औकात,चलकर के देखों.

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 24, 2012 at 9:25pm

नुरैन भाई, अच्छी ग़ज़ल कही है, अंतिम शेर दिल को छू रहा है , बधाई स्वीकार कर लीजियेगा कृपया |

Comment by Yogi Saraswat on November 24, 2012 at 11:12am

संसद के सोफे क्या समझेगे गावों का मर्म,
बेबस जनता की मुश्किलात,चलकर के देखों.

बहुत खूब , सुन्दर अल्फ़ाज़ , क्या बात है ! गरीबों के मर्म कौन समझता है आंसारी साब ? गज़ब के आश'आर

Comment by shalini kaushik on November 24, 2012 at 12:57am

ऐशों-आराम तय करते है मुकद्दर किल्लतों का,
सता से बाहर अपनी औकात,चलकर के देखों.

bahut khoob kaha hai aapne.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 22, 2012 at 4:56pm
बहुत खूब, बहुत ही उम्दा गजल पढने को मिली श्री नूरें अंसारी भाई 
किसी एक पंक्ति की बात नहीं सभी एक से बढ़कर एक हार्दिक बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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