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जिंदगी की हैसियत मौत की दासी की है .

   

बात न ये दिल्लगी की ,न खलिश की है ,
जिंदगी की हैसियत मौत की दासी की है .

 

न कुछ लेकर आये हम ,न कुछ लेकर जायेंगें ,
फिर भी जमा खर्च में देह ज़ाया  की है .

 

पैदा किया किसी ने रहे साथ किसी के ,
रूहानी संबंधों की डोर हमसे बंधी है .

 

नाते नहीं होते हैं कभी पहले बाद में ,
खोया इन्हें तो रोने में आँखें तबाह की हैं.

 

मौत के मुहं में समाती रोज़ दुनिया देखते ,
सोचते इस पर फ़तेह  हमने हासिल की है .

 

जिंदगी गले लगा कर मौत से भागें सभी ,
मौके -बेमौके ''शालिनी''ने भी कोशिश ये की है .
                       शालिनी कौशिक
                                 [कौशल ]

 

 

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Comment by shalini kaushik on November 27, 2012 at 11:51pm

saurabh ji v veenas ji utsah vardhan hetu hardik dhanyawad


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 27, 2012 at 8:25am

सुन्दर भावों की अभिव्यक्ति विधात्मक भी हो तो मन को और संतुष्ट करती है.

Comment by वीनस केसरी on November 26, 2012 at 11:51pm

बहुत खूब
सुन्दर भावाभिव्यक्ति

यह रचना शिल्पगत गुणों से ग़ज़ल विधा के बेहद करीब है, कुछ मूलभूत बातों का ध्यान रखें तो यह ग़ज़ल हो जाये
शुभकामनाओं सहित

Comment by shalini kaushik on November 26, 2012 at 10:57pm

utsah vardhan hetu aap sabhi ka aabhar


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 26, 2012 at 8:34pm

न कुछ लेकर आये हम ,न कुछ लेकर जायेंगें ,
फिर भी जमा खर्च में देह ज़ाया  की है .---बहुत सुन्दर भाव पूर्ण पंक्तियाँ खाली  हाथ जाना है फिर भी इंसान अंत समय तक धन का लालच नहीं छोड़ता बढ़िया प्रस्तुति बधाई आपको शालिनी जी 

 

पैदा किया किसी ने रहे साथ किसी के ,
रूहानी संबंधों की डोर हमसे बंधी है .

 

Comment by shikha kaushik on November 26, 2012 at 8:16pm
bahut bhavpoorn prastuti .aabhar
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 26, 2012 at 10:33am

पैदा किया किसी ने रहे साथ किसी के ,
रूहानी संबंधों की डोर हमसे बंधी है .------ये तो डोर उपरवाले की बनाई हुई है इस डोरे से वह किसो किसके साथ बांधे वही जाने 

नाते नहीं होते हैं कभी पहले बाद में ,  

खोया इन्हें तो रोने में आँखें तबाह की हैं. ----इसीलिए तो कहते है रोना नहीं, हां आँखे साफ़ करनी हो तो बात अलग है या दिखावा 
आपकी रचना के भाव बेहद पसंद आये, काव्य में यथार्थता झलक रही है । इसके लिए हार्दिक बधाई । पर आपकी रचनाओं में महिला होने पर बेबसी जो झलकती है, उससे बाहर  निकले, और नारी के महत्त्व को  पहचान जितनी हिम्मत बटोर उत्साह से बढे,उतना अच्छा है ।
Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on November 25, 2012 at 11:52pm

रूहानी संबंधों की डोर हमसे बंधी है .

बहुत ही उम्दा कहा है, शालिनी जी |

रूहानी रिश्ते खुदा के रिश्ते होते हैं, जो सबको एक ही डोर से जोड़ देते हैं 

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