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आधी जमींदारी हमारी भी है

अंततः हम एकल ही थे

स्मृति में कहाँ रही सुरक्षित

जन्म लेने की अनुभूति

और ना होशो हवास में

मौत को जी पायेंगे

समस्त

कौतुहल विस्मय

अघात संताप

रणनीति कूटनीति तो

मध्य में स्थित

मध्यांतर की है

उसमे भी

जब तुमने

ज़मीन छीनकर ये कहा की

सारा आकाश तुम्हारा

मैंने पैरों का मोह त्याग दिया

और परों को उगाना सीख लिया  

अब बाज़ी मेरे हाथ में थी

लेकिन हुकुम का इक्का

अब भी तुम्हारे पास ही रहा

 उकाबों का झुण्ड जब तब

नन्ही गौरैया के इर्द गिर्द

मंडराता रहा

बाज आ जाओ वरना

अब मैं नाखून उगाना सीख लुंगी

और तब

आस्मां में उड़ने के साथ साथ

जमी पर भी पैर मेरे होंगे

क्योंकि

तुम्हारे निजाम में

आधी जमींदारी हमारी भी है|

क्या कहते हो ???

गुल सारिका 

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Comment

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Comment by Anwesha Anjushree on January 10, 2013 at 6:54pm

:) prayas ka swagat....sunder

Comment by अमि तेष on January 4, 2013 at 10:36am

जब तुमने

ज़मीन छीनकर ये कहा की

सारा आकाश तुम्हारा

अच्छी रचना 

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 3, 2013 at 10:07pm

सुन्दर रचना

Comment by Rajeev Mishra on January 3, 2013 at 6:34pm

नन्ही गौरैया के इर्द गिर्द

मंडराता रहा

बाज आ जाओ वरना

अब मैं नाखून उगाना सीख लुंगी

और तब

आस्मां में उड़ने के साथ साथ

जमी पर भी पैर मेरे होंगे   bahut hi sundar lekhni jo vykt karti samay ki prabhuta aaj goraiya dekhne matr ko bhi to nahi es shahri kshetr main ! ati sundar !

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 2, 2013 at 7:15pm

क्रोध से भरी तेजस्वी रचना की लिए बधाई गुल सारिका जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 2, 2013 at 4:52pm

तब

आस्मां में उड़ने के साथ साथ

जमी पर भी पैर मेरे होंगे

क्योंकि

तुम्हारे निजाम में

आधी जमींदारी हमारी भी है|

क्या कहते हो ???.........................वाह! बहुत हिम्मत भरी ऊर्जस्वी रचना, 

हार्दिक बधाई प्रिय गुल सारिका जी 

Comment by राजेश 'मृदु' on January 2, 2013 at 4:29pm

अच्‍छी भाव दशा एवं सुन्‍दर निरूपण के लिए हार्दिक बधाई

Comment by vijay nikore on January 2, 2013 at 4:19pm

रचना प्रभावशाली है। बधाई।

विजय निकोर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 2, 2013 at 3:33pm

ऊर्जस्विता और ओजस्विता से पगी भाव-रचना के लिए बधाई, गुल सारिकाजी.

Comment by Er. Ambarish Srivastava on January 2, 2013 at 3:05pm

//बाज आ जाओ वरना

अब मैं नाखून उगाना सीख लुंगी

और तब

आस्मां में उड़ने के साथ साथ

जमी पर भी पैर मेरे होंगे//

आदरेया सीमा जी ने सच ही कहा है ...जगाती हुई इस रचना के लिए साधुवाद |

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