For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Gul Sarika Thakur's Blog (14)

सुनने वाली मशीन

अस्सी वर्षीय बाबू केदार नाथ ने अपने कानों में सुनने वाली मशीन लगाकर मफ़लर लपेट लिया| आईने में खुद को देखकर आश्वस्त हुए| मशीन पूरी तरह मफ़लर के नीचे छिप गया था| अब उन्होने पुराना टेप रिकार्डर निकाला और प्रिय गाना बजा दिया|

बरेली के बाज़ार में झुमका गिरा रे-कमरे में आशा भोसले की नखरीली आवाज़ गूंज उठी|

बाबू केदारनाथ के होंठो पर एक प्यारी सी मुस्कान खेल गई|

अजी सुनते हो! उनके कानो से एक तेज कटार सी आवाज टकराई|

अपने बाउजी को…

Continue

Added by Gul Sarika Thakur on August 11, 2017 at 11:47am — 6 Comments

पूछना उनसे

आँख कान और जुबान की सांकल खुले तो

पूछना उनसे

जिंदाबाद का नारा लगानेवालों में

कितने ज़िंदा थे यकीनन|  

पूछना आँखे खुल जाने के बाद

रोज निगली जाने वाली मक्खियों का स्वाद

पूछना वर्तनी उन गालियों का

जिसके एक छोर पर माँ तो दूसरे छोर पर

अक्सर बहने हुआ करती है|  

मगर मत पूछना जुबान से

उस मांसल देह का स्वाद

जिसकी कन्दराओं में ना जाने

कितनी माँए और बहने दुबकी होती है

मगर एक बार पूछना जरुर

इन सांकलों के खुल…

Continue

Added by Gul Sarika Thakur on April 4, 2014 at 2:00pm — 6 Comments

धीरे-धीरे समझे हम

इस दुनिया के तौर तरीके

धीरे धीरे समझे हम

गुलदस्तों की ओट में खंजर

धीरे-धीरे समझे हम|  …

Continue

Added by Gul Sarika Thakur on January 23, 2014 at 3:30pm — 12 Comments

सुनो ऋतुराज- 15

सुनो ऋतुराज- 15 

सुनो ऋतुराज!!

वह एक अन्धी दौड थी 

हांफती हुई 

हदें फलांगती हुई 

परिभाषाओं के सहश्र बाड़ो को 

तोडती हुई

फिर भी वह भ्रम नही टूटा 

जिसे तोडने के लिये संकल्पित थे हम 

ऋतुओं का मौन यूँ ही बना रहा 

सावन बरस् बरस कर सूख गया 

हम अन्धड़ के वेग मे भी तने रहे 

और आसक्ति का वृक्ष सूख गया 

सुनो ऋतुराज 

लमहों का बही खाता 

जब भी खोलोगे 

दग्ध ह्रदय पर लिखा 

शुभलाभ अवश्य दिखेगा …

Continue

Added by Gul Sarika Thakur on November 5, 2013 at 11:30am — 11 Comments

मेरी बारहखडी - 1

इश्क के मजार पर

पाकीजा रुह का दीया रखते वक्त

जैसे ही उसने चुन्नी से सिर ढांका  

लौ थर्रा कर बोली

उसके साथ ही उसका

दीन और ईमान भी वापस लौट गया

उसके साथ ही

ख्वाब और खुलूस भी खो…

Continue

Added by Gul Sarika Thakur on September 3, 2013 at 8:30pm — 7 Comments

एक सच्चा गलत आदमी

एक सच्चा गलत आदमी

सच का पैरोकार होता है

नारे लगाता है

हवा में मुट्ठियाँ भांजता है

भरोसा लपकता है

फिर उन्हे चबाता है

प्रगतिशील कहलाता है

एक सच्चा गलत आदमी

कभी पूरा झूठ नही बोलता

गलतियाँ नही दोहराता

कभी धन कभी ताकत

कभी भावनाओं के जोर पर

भोलेपन से खेलता है।

जब आत्मा धित्कारती है

बद्दुआएँ कोचती हैं

सुबह मन्दिर मे मत्था टेक आता है

चढावा चढाता है

फिर बैठ जाता है अनेक प्रेयसियों मे से

किसी एक…

Continue

Added by Gul Sarika Thakur on August 31, 2013 at 10:30pm — 13 Comments

सुनो ऋतुराज! – ११

सुनो ऋतुराज! – ११



ये मान मनौव्वल, झूमा-झटकी

बरजोरी, करजोरी और मुँहजोरी

तभी तक, जब तक

इस वैभवशाली ह्रदय का

एकछत्र साम्राज्य तुम्हारे नाम है

जिस दिन यह रियासत हार जाओगे

विस्थापित होकर कहाँ जाओगे?

फिर हम कहाँ और तुम कहाँ

सुनो ऋतुराज

हर नगरी की हर चौखट पर

पी की बाट जोहती सुहागिने

मुझ जैसी अभागन नही होती

खोने को सुख चैन

पाने को बेअंत रिक्त रैन

सुख की अटारी और दुख की पिटारी

अब दोनो तुम्हारे नाम…

Continue

Added by Gul Sarika Thakur on July 23, 2013 at 3:30pm — 12 Comments

कंजूस

ठीक ही तो कहा उसने 
क्या दरिद्रों की तरह 
लम्हों के पीले पत्ते 
बटोरती हो और 
और कबाड़ी वाले की तरह 
टेर लगाए फिरती हो 
एहसासों के मोती चुगो 
और राज हंसिनी कहलाओ 
और मैं सोचती हूँ 
उसकी जेब से 
अपने हिस्से की 
अठननी चवन्नी 
झपट कर भाग खड़ी होऊं 
कंजूस एक एक पाई का 
हिसाब रखता है

Gul Sarika 

Added by Gul Sarika Thakur on May 18, 2013 at 9:30pm — 9 Comments

आख़री निवेश

दोनों एक सांझा चूल्हे में सुलग रहे थे

नाउम्मीदी की गीली लकड़ी में

पूरी ताकत से फूँक मारी उसने

इश्क धुआं धुंआ हो गया

किसे पता था

इस धुंआ के छंटते ही

कलेजा काठ का और आँखे

पथरीली पगडंडी बन जाएंगी

जो ठीक वहीं आकर ठिठकती है

जहां रिश्ते की ताजी ताजी कब्र बनी है|

गजब के सब्र से उसने

बुझी हुई…

Continue

Added by Gul Sarika Thakur on May 15, 2013 at 11:02pm — 14 Comments

सुनो ऋतुराज

सुनो ऋतुराज!

मौसम बदलने और ईमान बदलने में फर्क होता है

ईमान बदलने और वक्त बदलने में फर्क होता है

लेकिन धरा के दरकने और ह्र्दय के दरकने में

कोई फर्क नहीं होता ..

क्योकि दोनो में निहित…

Continue

Added by Gul Sarika Thakur on May 14, 2013 at 7:30pm — 9 Comments

आधी जमींदारी हमारी भी है

अंततः हम एकल ही थे

स्मृति में कहाँ रही सुरक्षित

जन्म लेने की अनुभूति

और ना होशो हवास में

मौत को जी पायेंगे

समस्त

कौतुहल विस्मय

अघात संताप

रणनीति कूटनीति तो

मध्य में स्थित

मध्यांतर की है

उसमे भी

जब तुमने

ज़मीन छीनकर ये कहा की

सारा आकाश तुम्हारा

मैंने पैरों का मोह त्याग दिया

और परों को उगाना सीख लिया  

अब बाज़ी मेरे हाथ में थी

लेकिन हुकुम का इक्का

अब भी तुम्हारे…

Continue

Added by Gul Sarika Thakur on January 2, 2013 at 9:33am — 12 Comments

यूं ही खामोश रहो ...

जब कभी मेरी बात चले 

ख़्वाब में भी कोई ज़िक्र चले 

मेरे हमदम मेरे हमराज़ 

यूं ही खामोश रहो 

शायद ही कभी 

ठिठुरते हुए बिस्तर पे 

कभी चांदनी बरसे 

या फिर झील के ठहरे हुए पानी में 

कभी लहरे मचले 

जब कभी आँखों के समंदर में 

कोई चाँद उतरे 

मेरे हमदम मेरे हमराज 

यूं ही खामोश रहो…

Continue

Added by Gul Sarika Thakur on November 2, 2012 at 10:05pm — 9 Comments

प्रलय

निश्चेष्ट धरा को

अपनी गोद में उठाए

समुद्र हाहाकार कर उठा

थरथराते होंठो से

अस्फुट से शब्द लहराए

अ...ब...और ...स...हा... न...हीं जा...ता..

वि...धा....ता!!

अशांत समुद्र ज्वार को

सम्भाल नहीं पा रहा था

फिर भी धरा को समझा रहा था

आओ सो जाते हैं

सब कुछ भूल जाते हैं

आदि से लेकर अंत तक

कहाँ रह पाए मर्यादित

मनुज की तृष्णा और लालसा से

सदैव रहे आच्छादित

आज जबकि काल की जिह्वा

लपलपा रही…

Continue

Added by Gul Sarika Thakur on September 23, 2012 at 9:37pm — 5 Comments

दहलीज

जहाँ से यथार्थ की दहलीज

खत्म होती है

वहाँ से हसरतों का

सजा धजा बागीचा

शुरु होता है

जब भी कदम बढ़ाया

दहलीज फुफकार उठती है…

Continue

Added by Gul Sarika Thakur on September 22, 2012 at 11:00pm — 11 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

*दोहा*बरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।।*चौपाई*वह फुहार वह साथ…See More
yesterday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
yesterday
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
yesterday
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
yesterday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Saturday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Jul 9
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service