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हँस-हँस कर करते हैं आँसू ,सुख दुःख का व्यापार ,
बाहर वाली चौखट दुखती , चुभते वन्दनवार !!

मुरझाकर भी हर पल सुरभित ,पात-पात साँसों का,
मन को मजबूती देता है ,संबल कुछ यादों का !
क्षण भर हँसता,बहुत रुलाता,कुछ अपनों का प्यार ,
सारी उमर बिता कर पाया,यह अद्भुत उपहार ..!!

सिहरन नस-नस में दौड़े जब,हाँथ हवा गह जाती,
गुजरी एक जवानी छोटी, बड़ी कहानी गाती !
यूँ तो गँवा चुके हैं अपनी,सज धज सब श्रृंगार ,
है अभिमान अभी तक करता,नभ झुककर सत्कार .!!

दो प्यासी आँखें नित जिनके,देख रहीं हैं सपने,
होली दीवाली आते हैं ,अतिथि सरीखे अपने !
क्या कम है जो खिंची नहीं है आँगन में दीवार,
काल कहाँ ले आया जीवन ,एकाकी है द्वार ..!!

संघर्षों के बीच न जाने, कैसे यौवन गुज़रा,
याद नहीं खुलकर के कब था ,हँस पाया मन पगला !
कोने -कोने दहक रहे हैं ,अनुभव के अंगार,
कब तक ढोएँ इकतरफा इन, संबंधों का भार .!

-भावना तिवारी-

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Comment by अरुन शर्मा 'अनन्त' on January 10, 2013 at 4:18pm

आदरणीया बहुत ही सुन्दर गीत भाव पूर्ण अभिव्यक्ति हार्दिक बधाई.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on January 10, 2013 at 4:14pm

दो प्यासी आँखें नित जिनके,देख रहीं हैं सपने,
होली दीवाली आते हैं ,अतिथि सरीखे अपने !
क्या कम है जो खिंची नहीं है आँगन में दीवार,
काल कहाँ ले आया जीवन ,एकाकी है द्वार ..!!

संघर्षों के बीच न जाने, कैसे यौवन गुज़रा,
याद नहीं खुलकर के कब था ,हँस पाया मन पगला !
कोने -कोने दहक रहे हैं ,अनुभव के अंगार,
कब तक ढोएँ इकतरफा इन, संबंधों का भार .!

sundar abhivyakti hetu badhai 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 10, 2013 at 4:12pm

संबंधों की पहेली में उलझा संवेदनशील मन, क्या क्या महसूस करता है, उसकी कोमल अभिव्यक्ति.

बहुत सुन्दर गीत..हार्दिक बधाई डॉ. भावना तिवारी जी  


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 10, 2013 at 2:42pm

//दो प्यासी आँखें नित जिनके,देख रहीं हैं सपने,
होली दीवाली आते हैं ,अतिथि सरीखे अपने !//

आहा !! भावनाओं का ज्वार समेटी हुई ये पक्तियां बहुत ही ससक्त बन पड़ीं हैं, पूरी रचना कई कई बार पढ़ने को मजबूर करती है, बहुत ही खुबसूरत अभिव्यक्ति, बधाई स्वीकार करें आदरणीया भावना तिवारी जी ।

Comment by Pankaj Trivedi on January 9, 2013 at 9:43pm

भावना जी,

संघर्षों के बीच न जाने, कैसे यौवन गुज़रा,
याद नहीं खुलकर के कब था ,हँस पाया मन पगला !
कोने -कोने दहक रहे हैं ,अनुभव के अंगार,
कब तक ढोएँ इकतरफा इन, संबंधों का भार .!

इस बेहतरीन गीत-रचना के लिये दिल से बधाई... अदभूत !

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on January 9, 2013 at 4:02pm

bahut sundar is kavita ke liye bahut bahut badhaai aapko aadarneeyaa

Comment by vijay nikore on January 9, 2013 at 3:28pm

भावना जी, इस सुन्दर कविता के लिए बधाई।

विजय निकोर

Comment by Shyam Narain Verma on January 9, 2013 at 2:55pm

BAHOT KHOOB.....................

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