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      //-उलझन-//  
आक्रोश,क्रंदन,कड़वाहट
सीने में भरी झुंझलाहट..
मुझे मार डालेगी ....!!
मेरे भीतर का लावा 
फूट पड़ने को आमादा !
मेरे पपड़ाते होंठ 
मौन की मुखर बौखलाहट !
मेरे मसले हुए ख़्वाब ,
मेरे असहाय दिन ,
मेरी ज़ख़्मी रातें ..
मेरा समूचा वज़ूद भयाक्रांत है !!
विधाता तुमसे शिक़ायत है 
क्यूँ रचा  मुझे 
कच्ची माटी  से 
क्यूँ गढ़ा मुझे 
मढ़ा हृदय भावनाओं से !!
अंतस में धधकता ज्वाल ..
उठते हुए कई सवाल 
ये पीड़ित छटपटाहट !
मुझे मार डालेगी ..!!
        -भावना 

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on January 5, 2013 at 8:26am

भावना जी सादर,मन की पीड़ा जज्बात पूरी तरह शब्द बनकर बह निकले हैं. हार्दिक बधाई स्वीकारें.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 3, 2013 at 10:12pm

भावनाजी, आपके अंतस की वेदना मुखर हो कर उभर आयी है और उसका सचेत होना अत्यंत तोषकारी है.

सादर

Comment by Pankaj Trivedi on January 3, 2013 at 8:54pm

बहुत ही उम्दा और अति संवेदनशील अभिव्यक्ति के लिये दिल से बधाई देता हूँ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 3, 2013 at 7:53pm

वजूद के बिखरे टुकड़ों से भावाक्रांत आहत मन के स्वाभाविक सवालों की मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति. सादर.

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 3, 2013 at 6:08pm

वाह ह्रदय की छटपटाहट का सुन्दर चित्रण देखते ही बनता है, मन ले लिखी पंक्तियाँ मन में बस गईं हार्दिक बधाई आदरणीया.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 3, 2013 at 5:53pm

आपकी अति संवेदनशील भावनाओं को नमन डॉ भावना तिवाड़ी जी

Comment by राजेश 'मृदु' on January 3, 2013 at 5:52pm

मानव मन जब छटपटाता है तो ऐसा ही होता है और जब उसकी बात कोई नहीं सुनता तो वह विधाता से ही शिकायत करता है क्‍योंकि वही है जो हमेशा हर जगह आपके पास होता है, सुंदर प्रस्‍तुति

Comment by vijay nikore on January 3, 2013 at 5:16pm

भावना जी,

इतने सुन्दर भाव पढ़ने को कम ही मिलते हैं।

विधाता तुमसे शिक़ायत है
क्यूँ रचा  मुझे
कच्ची माटी  से
क्यूँ गढ़ा मुझे
मढ़ा हृदय भावनाओं से !!
बधाई।
विजय निकोर
Comment by Gambhir Singh on January 3, 2013 at 4:31pm
नायाब सत्य अभिव्यक्ति ।
Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on January 3, 2013 at 3:44pm

संवेदनाओं से भरी इस रचना के लिए बधाई हो आपको

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