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ग़ज़ल : सोन मछली आपको रोहू नज़र आने लगे

बहर : २१२२ २१२२ २१२२ २१२

----------------------------

जिस घड़ी बाजू मेरे चप्पू नज़र आने लगे

झील सागर ताल सब चुल्लू नज़र आने लगे

 

झुक गये हम क्या जरा सा जिंदगी के बोझ से

लाट साहब को निरा टट्टू नज़र आने लगे

 

हर पुलिस वाला अहिंसक हो गया अब देश में

पाँच सौ के नोट पे बापू नज़र आने लगे

 

कल तलक तो ये नदी थी आज ऐसा क्या हुआ

स्वर्ग जाने को यहाँ तंबू नज़र आने लगे

 

भूख इतनी भी न बढ़ने दीजिए मेरे हुजूर

सोन मछली आपको रोहू नज़र आने लगे

 ---------------------

स्वरचित एवं अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 1, 2013 at 2:47pm

जिस घड़ी बाजू मेरे चप्पू नज़र आने लगे

झील सागर ताल सब चुल्लू नज़र आने लगे------इतना भी घमंड ठीक नहीं 

 

झुक गये हम क्या जरा सा जिंदगी के बोझ से

लाट साहब को निरा टट्टू नज़र आने लगे-------जितना झुकते हैं लॊग तो सीधा समझ कर फायदा ही उठाएंगे ना 

 

हर पुलिस वाला अहिंसक हो गया अब देश में

पाँच सौ के नोट पे बापू नज़र आने लगे--------------पुलिस वाले की छोडिये पार्लियामेंट में क्या होता है जहां कितना बड़ा बापू का फोटो होता है ---बढ़िया कटाक्ष 

 

कल तलक तो ये नदी थी आज ऐसा क्या हुआ

स्वर्ग जाने को यहाँ तंबू नज़र आने लगे---------------कल तक थी बस जाने आगे क्या होगा 

 

भूख इतनी भी न बढ़ने दीजिए मेरे हुजूर

सोन मछली आपको रोहू नज़र आने लगे------भूख तो बढती ही जा रही है आज कल शार्क को भी निगल जायेंगे ---बहुत बढ़िया व्यंग्य 

बहुत शानदार ग़ज़ल हर शेर व्यंग्य का तीर चुभोता हुआ ,दाद कबूल करें  

 

Comment by विजय मिश्र on April 1, 2013 at 1:23pm
बेबाक बयानी - सधी हुई सुंदर और प्रसंशनीय रचना , हर शब्द ईमानदारी से अपने अर्थ रख रहा है . मन की बात पूरे का पूरा जमीन पर उतरी है .साधुवाद भाई धर्मेन्द्रजी . आगे भी ऐसी रचनाएँ आपके कलम से निकलती रहे -शुभकामना .
Comment by वीनस केसरी on March 31, 2013 at 11:25pm

शानदार ग़ज़ल हुई है
हर एक शेर कामयाब हुआ है
एक एक शेर के लिए ढेरों ढेर दाद


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 31, 2013 at 11:21pm

सर्वप्रथम विशिष्ट काफ़िया केलिए बधाई. 

फिर मतले से लेकर आखिरी शेर तक जो कुछ बयां हुआ है वह पूर्ववत आश्वस्त करता है कि इस ग़ज़ल पर दिया गया समय सार्थक हुआ.

झुक गये हम क्या जरा सा जिंदगी के बोझ से
लाट साहब को निरा टट्टू नज़र आने लगे

इस तेवर के लिए विशेष बधाई... .

भूख इतनी भी न बढ़ने दीजिए मेरे हुजूर
सोन मछली आपको रोहू नज़र आने लगे.. 

क्या अंदाज़ है कहने का.. . वाह वाह !

ढेर सारी दाद कुबूल फ़रमाइये, भाई.. .

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on March 31, 2013 at 11:09pm

बढ़िया गजल हुई है आ. धर्मेन्द्र कुमार जी
ये शेर बेहद शानदार लगा

हर पुलिस वाला अहिंसक हो गया अब देश में
पाँच सौ के नोट पे बापू नज़र आने लगे

Comment by बृजेश नीरज on March 31, 2013 at 9:48pm

बहुत सुन्दर लिखा है आपने! वर्तमान दशा पर आपका व्यंग्य बहुत सटीक और झकझोरने वाला है।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 31, 2013 at 6:05pm

बहुत सुन्दर गज़ल लिखी है आ० धर्मेन्द्र सिंह जी, सभी व्यंग बहुत पसंद आये... हार्दिक बधाई 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 31, 2013 at 5:12pm

सुन्दर गजल के माध्यम से शानदार व्यंग की लिए हार्दिक बधाई स्वीकारे श्री धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी,

अंतिम शेर में रोहू का क्या अर्थं है जो इस गजल का शीर्षक भी है 

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