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चाँद बसे आकाश में , फिर भी लगता पास |
मंजिल कितनी दूर हो , रहे मिलन की आस |
जब  ऊँची उडान भरो , दुनिया में हो  नाम | 
सब को अच्छी राह का , सदा मिले पैगाम | 
ग़मगीन दिल हो  जाये , सब कुछ लगे उदास |
फूलों संग  रहकर  भी , दिल पर हो ना रास  |
दो दिल टूटे राह में , कैसे बिगड़ी बात |
देख कर अब जलते हैं , तनहा बीते रात |
माया के संसार में , हर दिल धोखा खाय |
वर्मा नेक काम करो , चोट न लगने पाय  | 
श्याम नारायण वर्मा 

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Comment

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Comment by बृजेश नीरज on May 1, 2013 at 11:28pm

बहुत सुन्दर रचना! बधाई आपको! हल्की सी गेयता एक दो जगहों पर बाधित लग रही है।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 1, 2013 at 9:24pm

सुन्दर द्विपदियाँ आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी 

Comment by coontee mukerji on May 1, 2013 at 6:57pm

बहुत सुंदर खासकर  नेक काम भी करो और चोट न  लगे ....बहूत खूब ./ सादर / कुंती .

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 30, 2013 at 9:54pm

सुन्दर दोहे बधाई श्री स्याम नारायण वर्मा जी 

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 30, 2013 at 8:31pm

आदरणीय श्याम नारायण वर्मा साहब सुन्दर दोहों की रचना की है बहुत बहुत बधाई स्वीकारें. दुसरे दोहे में "उड़ान" से शिल्प बाधित हो रहा है. 

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 30, 2013 at 7:09pm

आ0 श्याम नारायण जी, सुन्दर रचना । ’’माया के संसार में, हर दिल धोखा खाय।  वर्मा नेक काम करो, चोट न लगने पाय।।’’ हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर,

Comment by राजेश 'मृदु' on April 30, 2013 at 7:09pm

बहुत अच्‍छी प्रस्‍तुति, सादर

Comment by बसंत नेमा on April 30, 2013 at 6:05pm

bahut khoob sir ,

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