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!!! नवगीत !!!


नयनन के कोर से, ढरकि गये अंसुआं।
खारे जल बिन्दु भी, बन गये मोतियां।।

जीवन के रंग में,
गुलशन बसंत में-
पतझर के ढ़ंग से,
उजड़ गयी बगिया।1...खारे जल..

नयनन के नील में,
सागर सी झील मे-
रेशम की गेंद संग,
डूब गये छलिया।2...खारे जल..

कर्म के सफर में,
काटों के पथ पर,
नागों को मथ कर,
नाचे गउ चरइया।3....खारे जल..

धर्म की जीत को,
सत्यम के रीति को,
गीता के गीत को,
गाते रहे रसिया।।4...खारे जल..


के0पी0सत्यम/मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 21, 2013 at 7:25am

आ0 रक्ताले सर जी, सुप्रभात व सादर प्रणाम!  सुबह-सुबह आपका स्नेह और आशीष पाकर मन अति गदगद हो गया।  आपका अन्तर्मन से हार्दिक आभारी हूं। सादर,

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 20, 2013 at 11:39pm

आदरणीय केवल प्रसाद जी सादर, बहुत सुन्दर नवगीत रचा है मंच पर हुई कार्यशाला का असर नवगीत की रचना में दिखने लगा है. बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 18, 2013 at 8:58pm

आ0  जवाहर लाल जी,  आपके स्नेह एवं अनुकरणीय प्रसंशा हेतु आपका तहेदिल से  हार्दिक आभार।   सादर,

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 18, 2013 at 6:39am

धर्म की जीत को,
सत्यम के रीति को,
गीता के गीत को, 
गाते रहे रसिया।।4...खारे जल..

सुंदर भावयुक्त पंक्तियाँ!

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 16, 2013 at 8:15pm

आ0 विरकाळी जी,  आपके स्नेह हेतु बहुत-बहुत हार्दिक आभार।   सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 16, 2013 at 8:14pm

आ0 संदीप जी,  आपके स्नेह हेतु बहुत-बहुत हार्दिक आभार।   सादर,

Comment by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on May 16, 2013 at 6:42pm
बहुत सुन्दर प्रयास आ॰ केवल प्रसाद जी।
Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on May 16, 2013 at 2:58pm

बहुत सुंदर प्रयास हुआ है आदरणीय
सादर बधाई
थोड़ा तुकांत पर भी पकड़ बनाइए और धीरे धीरे निखार आ जाएगा
सादर

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 15, 2013 at 8:56pm

आ0 राम शिरोमणि जी,    प्रिय मित्र!  आपके  स्नेह और प्रसंशा के लिए तहेदिल से हार्दिक आभार।  सादर,

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 15, 2013 at 8:55pm

आ0 कुशवाहा जी,     आपके  स्नेह और प्रसंशा के लिए तहेदिल से हार्दिक आभार।  सादर,

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