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सूखे गुल की दास्ताँ.!

अश्क आँखों में औ
तबस्सुम होठो पे है

सूखे गुल  की दास्ताँ
अब बंद किताबो में है

बीते वक़्त का वो लम्हा
कैद मन की यादों में है

दिल  में दबी है चिंगारी
जलती शमा रातो में है

चुभन है यह विरह की  
दर्द कहाँ अल्फाजों में है

नश्वर होती  है  रूह
प्रेम समर्पण भाव में है

अविरल चलती ये साँसे
रहती जिन्दा तन में है

खेल है यह तकदीर का
डोर खुदा के हाथो में है 

 

शशि  पुरवार

मौलिक और अप्रकाशित

Views: 508

Comment

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Comment by बृजेश नीरज on July 5, 2013 at 5:55pm

आपके इस प्रयास पर आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Ketan Parmar on July 4, 2013 at 9:09pm

22 22 22 2 ISPE METER RAKHE OR SAJKAR AAYEGI

MAIN BHI SIKH RAHA HU. BHAVISHYA KE LIYE SHUBH KAMNAYEE

Comment by Ketan Parmar on July 4, 2013 at 9:08pm

सूखे गुल  की दास्ताँ
अब बंद किताबो में है

yE SHER BEHR SE BAHAR HAI

ATTI SUNDER RACHNA

Comment by coontee mukerji on July 4, 2013 at 6:13pm

अश्क आँखों में औ
तबस्सुम होठो पे है

सूखे गुल  की दास्ताँ
अब बंद किताबो में है
बहुत सुंदर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 4, 2013 at 5:25pm

प्रस्तुति वस्तुतः उपस्थिति सदृश है.  

इस हेतु आभार

सादर

Comment by shashi purwar on July 4, 2013 at 1:14pm

atendra ji d p mathur ji aapka tahe dil se dhanyavad ,aapne apni pasand ko jahir kiya ,

Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on July 4, 2013 at 9:43am

चुभन है यह विरह की  
दर्द कहाँ अल्फाजों में है

विरह का दर्द होता ही ऐसा है ......आपके प्रेम के ये अलफ़ाज़ आपकी रचना में दिखती है ....भावपूर्ण रचना बधाई अतेन्द्र की तरफ से

Comment by D P Mathur on July 4, 2013 at 7:29am

नश्वर होती है रूह
प्रेम समर्पण भाव में है
उत्कृष्ट रचना के लिए बधाई !!

कृपया ध्यान दे...

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