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कुछ दरीचा हो यहाँ पर

भूख थी जेरे बह्स  और प्यास भी था मुद्द'आ 

फैसला होना नहीं था, मुल्तबी वह फिर हुआ 

 

रहमतों की बारिशें होंगी, मुनादी हो गयी 

और बातें छोडिये, पर रोटियों का क्या हुआ

 

लाख बोलो  कान पर,जूँ  तक नहीं अब रेंगता 

क्या असर होगा इन्हें, दो गालियाँ  या बददुआ

 

हाथ इनके हैं बहुत लम्बे, मगर डरना  नहीं  

चाहे  संसद में गढ़ें वो नामुआफ़िक मजमुआ 

 

वारदातें भी रहम की मांगती हैं  हर नज़र

कुछ दरीचा हो यहाँ पर, हर तरफ खुलता हुआ  

 

मौलिक और अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Dr Lalit Kumar Singh on July 27, 2013 at 5:56am

वारदातें भी रहम की मांगती हरसू  नज़र

इक दरीचा हो कहीं पर, उस तरफ खुलता हुआ  

 

मेरे प्रिय वीनस भाई

‘मुद्द'आ’ उर्दूदां लोग जब उच्चारण करते हैं तो ‘मुद्दुआ’ ही करते हैं. और आ. दुष्यंत कुमार ने भी इसका प्रयोग इसी तरह किया है. आज तक किसी आलोचक ने ऊँगली नहीं उठाई. यह शुद्ध है. देखें -

“भूख है तो सब्र कर,रोटी नहीं तो क्या हुआ

आजकल दिल्ली में है, जेरे बहस ये मुदद’आ

 

आप पहले व्यक्ति हैं. इसलिए आप असाधारण हैं.

आपने हौसला आफजाई की शुक्रिया. सादर 

Comment by वीनस केसरी on July 27, 2013 at 1:00am

वारदातें भी रहम की मांगती हैं  हर नज़र

कुछ दरीचा हो यहाँ पर, हर तरफ खुलता हुआ 


वाह वा इस शेर ने तो लाजवाब कर दिया

मतले में मुद् दआ के साथ हुआ  काफ़िया कैसे चला लिया सर जी ???

Comment by बृजेश नीरज on July 19, 2013 at 6:01pm

आदरणीय आपका आभार!

Comment by Ketan Parmar on July 19, 2013 at 11:48am

लाख बोलो  कान पर,जूँ  तक नहीं अब रेंगता

क्या असर होगा इन्हें, दो गालियाँ  या बददुआ

 

हाथ इनके हैं बहुत लम्बे, मगर डरना  नहीं  

चाहे  संसद में गढ़ें वो नामुआफ़िक मजमुआ

umdaa sher karamati

Comment by राज़ नवादवी on July 19, 2013 at 9:37am

रहमतों की बारिशें होंगी, मुनादी हो गयी 

और बातें छोडिये, पर रोटियों का क्या हुआ

वाह वाह! समाजी और सियासी तेवर की ग़ज़ल, बेबाक अशआर, बहुत खूब!

Comment by Dr Lalit Kumar Singh on July 19, 2013 at 9:13am

आदरणीय मेरे विचार से रेंगती अधिक उपयुक्त होगा।

 man gaye

Comment by बृजेश नीरज on July 18, 2013 at 12:09pm

बहुत ही सुन्दर बात कही आपने! आपको मेरी हार्दिक बधाई!
एक निवेदन करना चाहता हूं कि इस पंक्ति को देखें-

//लाख बोलो  कान पर,जूँ  तक नहीं अब रेंगता// 

आदरणीय मेरे विचार से रेंगती अधिक उपयुक्त होगा।
सादर!

Comment by MAHIMA SHREE on July 17, 2013 at 9:01pm

रहमतों की बारिशें होंगी, मुनादी हो गयी 

और बातें छोडिये, पर रोटियों का क्या हुआ

 

लाख बोलो  कान पर,जूँ  तक नहीं अब रेंगता 

क्या असर होगा इन्हें, दो गालियाँ  या बददुआ.... बहुत ही सही फ़रमाया आदरणीय .हर  आमजन की बात कहती उम्दा गजल के लिए बहुत -२ बधाई आपको


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 17, 2013 at 7:07pm

रहमतों की बारिशें होंगी, मुनादी हो गयी 

और बातें छोडिये, पर रोटियों का क्या हुआ...बहुत खूब! 

सुन्दर सामयिक गज़ल के लिए हार्दिक बधाई आ० डॉ० ललित जी 

सादर.

 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 17, 2013 at 5:48pm

कुछ उर्दू शब्दों के रचना के निचे अर्थ लिखे तो अधिक आनंद आयेगा डा. साहब | सादर 

कृपया ध्यान दे...

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