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इक दिया तुमने जलाया होता

इक दिया तुमने जलाया होता 

तम जरा सा ही हटाया होता 

हिन्द में रहते सभी हिंदी हैं 

भेद मजहब का मिटाया होता

 

साथ जीने में मजा आता है 

पाठ सबको ये पढ़ाया होता 

गर खता हमसे हुई माफ़ करो 

वाकया गुजरा भुलाया होता 

कुछ खुदा की यूं इबादत करते 

रोते बच्चे को हसाया होता 

चीरते हो बस मही का सीना 

गुल से आँचल भी सजाया होता 

दूध जिस माँ का पिया है तुमने

कर्ज  कुछ उसका चुकाया होता 


मौलिक व अप्रकाशित 

डॉ आशुतोष मिश्र 

आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी 

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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 12, 2013 at 10:02pm

आदरनीय सौरभ सर ...आपका मार्गदर्शन बस यूं ही मिलता रहे ..निदा फाजली जी की ग़ज़लों के बिषय में सिर्फ जानकारी जगजीत सिंग जी को सुनकर हुई ..उन्हें पढने का मौका कभी नहीं मिला ..आपने अच्छा किया की जानकारी दे दी ..मुझसे अनजाने में जो खता हो गयी थे उसे सुधारने का मौका मिला ..ओपन बुक्स ओं लाइन ज्वाइन करने के बाद ग़ज़ल सीखने का मौका मिला ..बस आप मुझे मेरी हर ग़ज़ल पर खुलकर चाहे कितना भी कटु हो बताते जाएँ ..ताकी ग़ज़ल लिखने का मेरा जूनून कम न हो ..सादर प्रणाम के साथ 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 11, 2013 at 1:10pm

डॉ. आशुतोष, आपकी ग़ज़ल पर दाद कह रहा हूँ.

आपके कहे कई अशार उम्दा हुए हैं. बधाई.. . 

आप २१२२ २१२२ २२ मेन्शन कर दिये होते तो नये ग़ज़लकारों को या प्रयासकर्ताओं को आपकी ग़ज़ल को अरुज़ के लिहाज़ से समझने में सहूलियत होती.

एक बात - 

कहे हुए से इन्फ्लुएन्स होना आश्चर्य नहीं, लेकिन ऐसे नहीं -

कुछ खुदा की यूं इबादत करते 

रोते बच्चे को हसाया होता ... ..  निदा फ़ाज़ली एकदम से याद आगये.

 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 5, 2013 at 8:36pm

आदरणीया लता जी , महिमा जी , शेखर साहेब , अरुण जी , विजय ई लादिवाला सर , वंदना जी आप सभी के प्रेरणा देने वाले उत्साहवर्धक शब्दों के हार्दिक धन्यवाद ..भिविस्य में भी आप सभी का स्नेह ऐसे ही मिलता रहेगा ऐसी आशा के साथ 

Comment by Lata tejeswar on August 3, 2013 at 8:40am

बहुत-२ बधाई आपको.....बहुत ही सुन्दर रचना

Comment by MAHIMA SHREE on August 2, 2013 at 11:06pm

बहुत ही बढ़िया गज़ल हुयी है आदरणीय ..बहुत-२ बधाई आपको

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on August 2, 2013 at 6:18pm

आदरणीय डॉ साहब, आपकी यह रचना मंत्रमुग्ध करने वाली है, नमन

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 2, 2013 at 2:44pm

वाह आदरणीय वाह बहुत ही सुन्दर रचना बधाई स्वीकारें.

Comment by विजय मिश्र on August 2, 2013 at 12:44pm
आशुतोषजी ! बधाई , बहुत बेढंगी बात को ढंग से शब्दों के सुंदर हार पहनाए आपने . हम सभी अपने हिस्से का धुप सेंकने में मशगूल हैं . दुखद है .
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 2, 2013 at 10:39am

दूध जिस माँ का पिया है तुमने

कर्ज  कुछ उसका चुकाया होता -----बहुत सुन्दर और सार्थक रचना के लिए हार्दिक बधाई श्री अशुतोल्श मिश्र जी 

Comment by vandana on August 2, 2013 at 6:22am

साथ जीने में मजा आता है 

पाठ सबको ये पढ़ाया होता 

बहुत बढ़िया 

कृपया ध्यान दे...

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