सुनो
क्या कहती हैं
माताएं , बहने , सखी सहेलियाँ
वक्त बदल चुका है
सुनना , समझना और विमर्श कंरना
सीख लो
स्वामित्व के अहंकार से
बाहर निकलो
सहचर बनो
सहयात्री बनो
नहीं तो ?
हाशिये पे अब
तुम होगे
हमारे पाँव जमीं पर हैं
और इरादे मजबूत
सोच लो ?
मौलिक व् अप्रकाशित
Comment
हाशिये पे अब
तुम होगे
हमारे पाँव जमीं पर हैं
और इरादे मजबूत
सोच लो ?.................वाह ! वाह!
ये ज़ज्बा हो तो अपने अस्तित्व को तलाशती नारी हर जंग जीत ले ..:))
हार्दिक शुभकामनाएं
इस सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई।
सादर,
विजय निकोर
बिलकुल ठीक आदरणीया महिमा श्री जी इसी सोच की जरुरत है नारियों को सुन्दर संदेशात्मक प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकारें.
चेतावनी में मजबूत इरादों के साथ जोश दिखाई दे रहा है | यह भी सही है कि अन्याय सहने की भी सीमा होती है |
इसमें आप सफल रही है | बधाई
आदरेया, आप तो डरा रही हैं । कभी-कभी कुछ प्रार्थनाएं यदि बहुत तेजी से पढ़ी जाएं तो लगता है कि भक्त भगवान की अर्चना नहीं बल्कि उन्हें धमका रहा हो । हाशिए पर कोई ना रहे यही कामना है, सादर
बहुत सुन्दर .. बधाई आप को
बहुत सुंदर व् सार्थक रचना, बहुत बहुत बधाई आदरणीया महिमा जी
स्वामित्व के अहंकार से
बाहर निकलो
सहचर बनो
सहयात्री बनो
नहीं तो ?
हाशिये पे अब
तुम होगे
सुन्दर रचना ..अच्छी चेतावनी ....बदलाव जरुरी है अन्याय कब तक सहा जाए
महिमा जी जय श्री राधे
भ्रमर ५
इस चेतावनी का जवाब नहीं..वाकई शानदार..सादर बधाई के साथ
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