For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

त्रिभंगी छंद ( प्रकृति को समर्पित)............ डॉ० प्राची

छंद त्रिभंगी : चार पद, दो दो पदों में सम्तुकांतता, प्रति पद १०,८,८,६ पर यति, प्रत्येक पद के प्रथम दो चरणों में तुक मिलान, जगण निषिद्ध 

रज कण-कण नर्तन, पग आलिंगन, धरती तृण-तृण, अर्श छुए  

कर तन मन चंचल, फर-फर आँचल, मुक्त उऋण सी, पवन बहे

सुन क्षण-क्षण सरगम, अन्तर पुर नम, विलयन संगम, भाव बिंधे

सुन्दरतम नियमन, श्रुति अवलोकन, लय आलंबन,  सृजन सुधे 

मौलिक और अप्रकाशित 

Views: 1000

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 23, 2013 at 2:43pm

वीनस जी,

आपके कहे से पूर्णतः सहमत हूँ कि " छन्द का मूल विधान भी दर्शाना चाहिए"....सो विधान को मूल पोस्ट के साथ एड कर दिया गया है. 

भाईजी ये रचना एक विशेष मनोदशा की उत्पत्ति है, जिसमें प्रकृति की ख़ूबसूरती और अनंत विस्तार को प्रकृति का अभिन्न अंश बन कर उसमें लीन हो कर जी जाने का वर्णन है..

इस छंद रचना पर आपकी शुभकामनाओं के लिए हृदय से आभारी हूँ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 23, 2013 at 2:26pm

रचना पर उत्साहवर्धक अनुमोदन के लिए हार्दिक आभार आ० मीना पाठक जी, आ० वंदना जी, आ० सुरेन्द्र शुक्ला जी, आ० नीरज कुमार नीर जी, आ० अभिनव अरुण जी.

आप सबकी शुभकामनाओं और प्रोत्साहन के लिए हार्दिक धन्यवाद 

सादर!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 23, 2013 at 2:22pm

छंदबद्ध रचना पर उत्साहवर्धक अनुमोदन के लिए हार्दिक आभार आदरणीया अन्नपूर्णा बाजपेई जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 23, 2013 at 2:21pm

आदरणीय अखिलेश श्रीवास्तव जी 

आपको यह रचना पसंद आई और आपने लेखन को मान दिया ..इस हेतु आपकी आभारी हूँ..

रचना की संप्रेषणीयता पाठकों तक यथा पहुँच सके तो रचनाकार लेखन के प्रति आश्वस्त होता है. आपकी सजग पाठकीयता के लिए धन्यवाद.

सादर 

Comment by राजेश 'मृदु' on September 23, 2013 at 12:47pm

बहुत ही सुंदर रचना । छंद त्रिभंगी ना भी हो तो भी आपकी शब्‍दावली कुछ इस तरह की होती है जो बरबस अंतर को आंदोलित करती हैं पर इस आंदोलन में हाहाकार नहीं होता है एक मधुसिक्‍तता होती है जो कांत भाव से सबकुछ आच्‍छादित कर लेती है जैसे नुपूर की ध्‍वनि  कभी दूर कभी पास से आती -जाती रहती हो, सादर

Comment by रविकर on September 23, 2013 at 12:09pm

शुभ छंद त्रिभंगी, है सतरंगी, कुदरत वर्णन, श्रेष्ठ हुआ |
शुभ भाव अनोखे, अक्षर चोखे, शब्द संचयन, हृदय छुआ ||

शुभकामनायें आदरेया

Comment by Meena Pathak on September 22, 2013 at 7:54am

रज कण-कण नर्तन, पग आलिंगन, धरती तृण-तृण, अर्श छुए  

कर जुल्फें चंचल, फर-फर आँचल, मुक्त उऋण सी, पवन बहे........... बहुत सुन्दर रचना, बधाई आ० प्राची जी 

Comment by vandana on September 22, 2013 at 7:19am

बहुत ही सुन्दर रचना आदरणीया डॉ. साहिबा 

Comment by वीनस केसरी on September 21, 2013 at 11:18pm

आदरणीया
त्रिभंगी छन्द के लिए हार्दिक बधाई

जैसे ग़ज़ल की पोस्ट में मात्रा दर्शा दिया जाता है छन्द का मूल विधान भी दर्शाना चाहिए
साथ ही इसका हिन्दी भावार्थ भी प्रकाशित कीजिये जिससे इस उच्च स्तरीय रचना को नए आयाम से समझा जा सकते और आनंद बढ़े
सादर

Comment by MAHIMA SHREE on September 21, 2013 at 9:58pm

बेहद सुंदर  त्रिभंगी छंद शब्द संयोजन कमाल का .... बहुत -२ हार्दिक बधाई आपको आदरणीया प्राची जी

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दोहे -रिश्ता
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी रिश्तों पर आधारित आपकी दोहावली बहुत सुंदर और सार्थक बन पड़ी है ।हार्दिक बधाई…"
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"तू ही वो वज़ह है (लघुकथा): "हैलो, अस्सलामुअलैकुम। ई़द मुबारक़। कैसी रही ई़द?" बड़े ने…"
Monday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"गोष्ठी का आग़ाज़ बेहतरीन मार्मिक लघुकथा से करने हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह…"
Monday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"आपका हार्दिक आभार भाई लक्ष्मण धामी जी।"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"आ. भाई मनन जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई।"
Monday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"ध्वनि लोग उसे  पूजते।चढ़ावे लाते।वह बस आशीष देता।चढ़ावे स्पर्श कर  इशारे करता।जींस,असबाब…"
Sunday
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"स्वागतम"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अजय जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
Saturday

© 2025   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service