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"डॉ साहिब, हमें बेटी नहीं चाहिए. आप बहू का एबॉर्शन कर दीजिए."
"ठीक है, आप लोग कल शाम मेरे प्राइवेट क्लिनिक पर आ जाईए".
"कल नहीं डॉ साहिब, हम लोग अगले हफ्ते ही आ पाएंगे"
"अगले हफ्ते क्यों ?"
"क्योंकि अभी नवरात्रे चल रहे हैं "

(मौलिक एवँ अप्रकाशित्)

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 10, 2013 at 11:29am

रचना पसंद करने के लिए सादर आभार आदरणीय विजय निकोर जी


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 10, 2013 at 11:28am

रचना पसंद करने के लिए सादर आभार सचिन देव जी


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 10, 2013 at 11:27am

सादर आभार अग्रज लक्ष्मण प्रसाद लड़ीवाला जी


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 10, 2013 at 11:26am

दिल से धन्यवाद कहता हूँ आदरणीय गिरिराज भंडारी जी


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 10, 2013 at 11:26am

लघुकथा के मर्म तक पहुँचने हेतु सादर आभार आद०  डी  पी माथुर जी  .

Comment by MAHIMA SHREE on October 6, 2013 at 6:03pm

उफ़ .... भारतीय जनमानस  दर्शन और रहस्यवाद में जितना ही उन्नत है सामजिक और धार्मिक कर्मकांड में उतना ही उल्टा .. आदरणीय योगराज सर  आपकी लघु कथा इस दोगली  मानसिकता की तस्वीर को चंद शब्दों में बिना किसी पात्र के नाम  कितनी खूबसूरती से कह जाती है ...  जितनी भी तारीफ की जाए कम है ..

ह्रदयतल से आपको बधाई आदरणीय सर

Comment by Shubhranshu Pandey on October 6, 2013 at 4:18pm

आदरणीय योगराज जी, सुन्दर कथा.

लड़कियाँ केवल तस्वीरों में ही पसन्द आती हैं. घरों में हो तो परेशानी और बाहर हो तो दूसरों को परेशानी...बहुत बहुत बधाई...

सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 6, 2013 at 4:03pm

आदरणीय सर 

पाखंडी दोहरी मानसिकता के लोगों की सोच की सताहीयता और घृष्टता को दर्शाती सुन्दर सार्थक संदेशपरक लघुकथा.

इस कसी हुई लघुकथा पर हार्दिक बधाई 

सादर.

Comment by Ravi Prabhakar on October 6, 2013 at 12:45pm

श्री योगराज जी,
सादर चरण वंदना ।
    बेहद सटीक और कसे शब्दों से आपने समाज के दोहरे चरित्र का चित्रण किया है। जैसे एकदम से कोई जोरदार पटाखा फूटता है परन्तु उसकी सन्न-सन्न बहुत देर कानों में गूंजती रहती है, यह आपकी लघुकथाओं की विशेष विशेषता होती है। लघुकथा होनी भी ऐसी ही चाहिए।  आप बहुत अल्प शब्दों में अपनी पूरी बात कह जाते हैं ।  भविष्य में भी आप अपनी कृतियों से साहित्य जगत को सराबोर करते रहेंगें इसी दुआ से आपको हृदय से शुभकामनाएं । आपकी और रचनाओं का बेसब्री से इंतजार रहेगा।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 6, 2013 at 10:43am

आदरणीय गुरुदेव, आपकी लघुकथायें हम लोगो के लिए शो रूम में रखे नमूनों की भाति होती है, कम शब्दों में कैसे उन बातों को आप समेटते हैं जिन्हें लिखने के लिए कई पन्नों की आवश्यकता हो । 

अभिभूत हूँ इस लघुकथा को पढ़कर, बहुत बहुत बधाई आदरणीय । 

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