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ग़ज़ल.. निलेश 'नूर' --चलो चलें अब यहाँ से यारो, रहा न अपना यहाँ ठिकाना

1 २ १ २ २ / १ २ १ २ २/ १ २ १ २ २ /१ २ १ २ २

चलो चलें अब यहाँ से यारो, रहा न अपना यहाँ ठिकाना,
नहीं रहा अब, जो हम से रूठे, किसे भला है हमें मनाना.
***
था इश्क़ हमको, था इश्क़ तुमको, मगर बगावत न कर सकें हम,
न तुम ने छोड़ा, न बेवफ़ा हम, न तुम ने समझा, न हम ने जाना.
***
शराब छोड़ी, नशा बुरा था, नज़र से पी ली, नज़र मिलाकर,
नज़र नज़र में नशा चढ़ा यूँ, वो भूल बैठा मुझे पिलाना.
***
न फेरियें मुंह, अभी से साहिब, अभी सफ़र ये शुरू हुआ है,
कत’आ करो तुम अभी न रिश्ता, इसे है सदियों तलक निभाना.
***
खिंचा मै आऊँ, तुम्हारी जानिब, लगे बुलावा, लबों की लरज़िश,
तुम्हारी ज़ुल्फ़ें लगे घटा सी, महक तुम्हारी करे दीवाना.
***
भड़क रहें है दिलों में शोले, थिरक रही है लवें दीयों की,
लगाए सावन, ये आग लेकिन, नहीं वो जानें इसे बुझाना.
***
मुझे अभी तक हैं याद आतें, बिखर गए जो हसीन सपने,
सिसक रहे है जो दिल में अब तक मगर मुनासिब है भूल जाना.
***
सुनों पिया तुम, जवाब दो तुम, कहाँ छुपे हो मेरे ख़ुदा तुम,
बहुत बुरा है ये दिल लगाना, यूँ दर्द देकर दवा छुपाना.
***
तुम्हे लगी जो फ़क़त कहानी, जिया उसे ‘नूर’ जिंदगी भर,
वही तो थी बस मेरी हक़ीक़त, जिसे समझते रहे फ़साना.
*** *** *** *** *** *** *** *** *** *** ***
.
मौलिक एवं अप्रकाशित
निलेश 'नूर' 

Views: 1036

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 17, 2013 at 10:52pm

आदरणीय वीनस जी .. लेखन सतत प्रक्रिया है और उसमे सुधार भी ... इसी के तहत कुछ सुधार किये है जिसमे मंच के सदस्यों का योगदान भी है ...
सभी का आभार .. आप को ग़ज़ल पसंद आई .. इससे बहुत उम्मीद और हिम्मत मिली है .. बेहतर रचने का सतत प्रयत्न रहेगा ..
आभार 

Comment by वीनस केसरी on October 17, 2013 at 9:31pm

बहुत अच्छा कहा भाई
अच्छे अच्छे जानकारों को मैंने इस बहर पर औंधे मुंह गिरते देखा है .... बहुत कठिन बहर को बहुत खूबसूरती से निभा ले गए

हालांकि पिछली बार मुझे कुछ बातें दिखी थी.... अब आया हूँ तो ग़ज़ल दोष मुक्त दिख रही है .. आपने दुरुस्त कर लिया होगा 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 17, 2013 at 6:40am

आभार मोहन जी; अरुण जी.. धन्यवाद   


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on October 17, 2013 at 12:18am

आदरणीय नीलेश जी, शानदार गज़ल सुनाने के लिये शुक्रिया..........

शराब छोड़ी, नशा बुरा था, नज़र से पी ली, नज़र मिलाकर,
नज़र नज़र में नशा चढ़ा यूँ, वो भूल बैठा मुझे पिलाना.

वाह, वाह, वाह !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

Comment by मोहन बेगोवाल on October 16, 2013 at 9:39pm

 श्रीमान निलेश जी , उम्दा गजल के लिए बधाई स्वीकार करें 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 16, 2013 at 5:24pm

धन्यवाद राहुल जी.  

Comment by RAHUL VERMA on October 16, 2013 at 5:00pm

वाह निलेश जी....बेहद कठिन 'बहर' को निभाते हुए एक बेहद उम्दा ग़ज़ल कही है आपने......तहे-दिल से मुबारकबाद आपको.....मेरे हिसाब से हासिल-ए-ग़ज़ल शे'र है-
मुझे अभी तक हैं याद आतें, बिखर गए जो हसीन सपने,
सिसक रहे है जो दिल में अब तक मगर मुनासिब है भूल जाना.

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 16, 2013 at 2:52pm

धन्यवाद आदरणीय अरुण शर्मा 'अनन्त' जी. स्नेह एवं मार्गदर्शन करतें रहें.
आभार  

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 16, 2013 at 2:12pm

आदरणीय निलेश जी वाह बहुत ही दमदार अशआर प्रेम रंग में रंगी खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने दिली दाद कुबूल फरमाएं.

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 16, 2013 at 1:45pm

शुक्रिया बृजेश जी. आभार  

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