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गजल: चांदनी आज तेरे छत पे अकेली होगी/शकील जमशेदपुरी

 बह्र: 2122 1122 1122 22

________________________________

जिंदगी और न अब कोई पहेली होगी
फिर से हाथों में मेरे तेरी हथेली होगी

प्यार में ताने सुनाने लगी दुनिया अब तो
क्या पता था मुझे नाम उसके हवेली होगी

कान किसने भरे उसके वो खफा है मुझसे
वो कोई और नहीं उसकी सहेली होगी

इश्क करती है किसी से वो इबादत की तरह
वो मुहब्बत के शहर में तो नवेली होगी

है खबर आज शहर में तू नहीं है शायद
चांदनी आज तेरे छत पे अकेली होगी

-शकील जमशेदपुरी

________________________

*मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 932

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Comment by Sushil.Joshi on October 24, 2013 at 7:23pm

बहुत खूब आ0 शकील भाई जी....

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 22, 2013 at 5:52pm

वाह व्वा .. बहुत खूब 

है खबर आज शहर में तू नहीं है शायद
चांदनी आज तेरे छत पे अकेली होगी.... क्या कहनें 

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on October 21, 2013 at 11:26pm

मजा आ गया आखिरी शेर पर दिली दाद आपको |

Comment by annapurna bajpai on October 21, 2013 at 6:47pm

आदरणीय शकील जमशेद पूरी जी बहुत ही उम्दा भावों मे पगी हुई गजल , बहुत बधाई आपको । 

Comment by विजय मिश्र on October 21, 2013 at 5:55pm
काबिलेतारीफ .
Comment by Saarthi Baidyanath on October 21, 2013 at 12:52pm

वाह जी जनाब ...क्या शेर पढ़ा आपने 

है खबर आज शहर में तू नहीं है शायद
चांदनी आज तेरे छत पे अकेली होगी.....लाजवाब :)

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 21, 2013 at 12:20pm

 आदरणीय शकील जी ..आपका यह शेर इस ग़ज़ल की जान हैं

है खबर आज शहर में तू नहीं है शायद
चांदनी आज तेरे छत पे अकेली होगी....तकनीकी पक्ष मेरा भी उतना सुद्रढ़ नहीं है ..भाव बहुत अच्छे लगे ..आपको हार्दिक बधाई के साथ 

Comment by वीनस केसरी on October 21, 2013 at 1:50am

आख़िरी शेर पसंद आया

दूसरा शेर भर्ती का लगा

Comment by शकील समर on October 20, 2013 at 11:08am

आरदणीय Saurabh Pandey जी
आपके आशीर्वाद के साये में निरंतर बेहतर करने का प्रयास जारी है।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 20, 2013 at 10:21am

एक के बाद एक बढ़िया ग़ज़ल पेश कर जनाब शकील साहब आपने महफ़िल में चार चाँद लगा दिया है इस ग़ज़ल के भी सभी अशआर बेहतरीन है दिली दाद कुबूल करें

कृपया ध्यान दे...

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