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(दिगपाल छंद विधान:- यह छंद 24 मात्रायों का, जिसमें 12 -12 में यति के साथ चरण पूर्ण होता है)

तजि अधर्म,कर्म,सुधर्म कर,
गीता तुझे बताए I 
हों शुद्ध,बुद्ध,प्रबुद्ध सब,
निज धर्म को न भुलाए I I 

धर नव नीव स्वधर्म की,
शिव ही सत्य मानिए I 
छोड़ सकल लोभ मोह,
ऒम ही सर्व जानिए I I

मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 2, 2013 at 5:48am

कवि देवेन्द्रजी, यह क्या कर रहे हैं आप ?

यदि आप रचनाकर्म के प्रति निश्चयी हैं तो सुनिये, कि, उत्साह मात्र छांदसिक रचनाकर्म को साधने का माध्यम और कारण होता तो सभी अनायास छंदबद्ध रचनायें करते.


मात्रिक छंदों की रचना के साथ एक बात और होती है जो पदों की मात्राओं की गणना के पहले होती है जिसे शब्द-संयोजन कहते हैं. यानि पद और चरणों में सम और विषम शब्दों का क्रमवार आना. आपकी पंक्तियाँ उसका अनुपालन तो नहीं ही करती हैं. आपने जो दिगपाल छंद के बारे में अपने संक्षिप्त विधान में लिखा है उसको भी आप मानते नहीं दीखते.
१२-१२ की यति आप कहते तो हैं लेकिन शायद आपको मालूम ही नहीं है कि इसका अर्थ होता क्या है. वर्ना तजि अधर्म,कर्म,सुधर्म कर  या शुद्ध,बुद्ध,प्रबुद्ध सब, या निज धर्म को न भुलाए  आदि चरणों की कुल कितनी मात्राएँ हो रही हैं, यह बात आपको स्पष्ट समझ में आ जाती.

आपका प्रयास सम्माननीय है. लेकिन आप अपने रचनाकर्म को गंभीरता से लें तो ही आपकी रचनाओं की प्रतिष्ठा होगी.
आदरणीया प्राचीजी ने बहुत कुछ स्पष्ट कहा है. उसके अनुसार छंद रचना करें, भाईजी.
शुभेच्छाएँ
 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 30, 2013 at 11:38pm

आ०  देवेन्द्र पाण्डेय जी 

आपने दिगपाल छंद का जो विधान साझा किया है , आपकी प्रस्तुति मात्रिकता के लिहाज से उसका पालन नहीं करती 

सनातनी छंदों में मात्रिकता के प्रति पूर्णतः संवेदन शील होना ही चाहिए. 

दिगपाल छंद चार पदों का छंद है जिसमें प्रति पद १२, १२ पर यति होती है.

दो -दो पदों में समतुकांतता होती है 

प्रत्येक चरण का अंत दो दीर्घ से किया जाता है.... इस छंद के विधान पर मेरी जानकारी इतनी ही है.

सुधि जानकार विस्तार से विधान को साझा करें ताकि दोहा और रूपमाला छन्द के काफी करीबी इस छंद के बारे में भी सबको जानकारी प्राप्त हो सके!

सादर 

Comment by Devendra Pandey on October 29, 2013 at 2:00pm

Adarniya Doctor Saab Mere Adhyayan Anusaar to Itna Hi Chhand Vidhaan hai Is Chhand, Magar Aapko Lag Rha hai to krapya Is Sandarbh mein Prakash Daalein Jisse Main Aswasth ho sakoon Sadarr. 

Comment by Dr Ashutosh Vajpeyee on October 28, 2013 at 6:17pm

जहाँ तक मेरा ज्ञान है बन्धु यह छन्द शास्त्रीय नहीं है कहाँ पढ़ा आपने और पूरा विधान भी कुछ स्पष्ट नहीं हुआ 

Comment by Devendra Pandey on October 28, 2013 at 4:12pm

Jee Adarniya Is chhand Ke Antargat 12 -12 mein yati ka vidhaan to nishchit hai parantu mere alpgyan anusaar lagu guru ka vichaar nhn kiya gaya hai 

Comment by राजेश 'मृदु' on October 28, 2013 at 3:00pm

आपका सद्प्रयास रूचिकर लगा किंतु छंद विधान स्‍पष्‍ट समझ नहीं पाया, 24 मात्रा का विधान एवं 12-12 का क्रम तो समझ गया पर लघु-गुरु कहां हों या नहीं हों इसे भी स्‍पष्‍ट कर दें तो सुगमता होगी, सादर

Comment by Devendra Pandey on October 28, 2013 at 11:36am

Adarniya Ramesh Kumar Chauhan Jee Snehil Tippani,Pratikriya ke liye Aapka Bahut bahut Abhaar 

Comment by Devendra Pandey on October 28, 2013 at 11:35am

Adarniya Laxman Prasad Ladiwala Sir Aapka Hardik Abhaar 

Comment by रमेश कुमार चौहान on October 27, 2013 at 11:03pm

तजि अधर्म,कर्म,सुधर्म कर,
गीता तुझे बताए I ---------------------बहुत ही सुंदर भाईजी बहुत बहुत बधाई

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 27, 2013 at 10:39pm

अधर्म को त्याग कर "सत्यम शिवम् सुन्दरम" अपनाने का आह्वान करती सुन्दर रचना के लिए बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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