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ग़ज़ल -निलेश 'नूर' ---ख़ुशबू

२ १ २  २   १ १ २ २  १ १ २ २, २ २ /११२


दिल के ज़ख्मों से उठी जब से गुलाबी ख़ुशबू,
शह्र में फ़ैल गई मेरी वफ़ा की ख़ुशबू.
...

ये महक, बात नहीं सिर्फ हिना के बस की,  
गोरी के हाथों महकती है पिया की ख़ुशबू.
...

फूल को ख़ुद में समेटे हुए थी कोई क़िताब,
फूल से आने लगी आज क़िताबी ख़ुशबू. 
...

वो कडी धूप में निकले तो हुआ यूँ महसूस,
जैसे निकली हो पसीने में नहाती ख़ुशबू.  
....

चंद लम्हात गुज़ारे थे तुम्हारे नज़दीक़,  
बस उसी रोज़ से पहनी है तुम्हारी ख़ुशबू. 
....

दिल के जंगल में खिला याद का महुआ जो कभी,
‘नूर’ को याद बहुत आई कुँवारी ख़ुशबू.  
..........................................................
निलेश 'नूर' 
मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 813

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 18, 2013 at 8:39am

धन्यवाद आदरणीय अरुण जी, सौरभ जी राजेश कुमारी जी ..... आभार  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 17, 2013 at 2:26pm

जी नीलेश जी मेरा संशय दूर हुआ हार्दिक धन्यवाद ,पुनः ग़ज़ल की बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 17, 2013 at 1:33pm

वाह भाईजी वाह ! बहुत खूब !!

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 17, 2013 at 1:12pm

आदरणीय निलेश जी बहुत ही बढ़िया खुशबूनुमा ग़ज़ल पेश की है आपने

वाह वाह दिली मुबारकबाद कुबूल फरमाएं.

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 17, 2013 at 9:07am

सभी मित्रो का धन्यवाद ... आत्याधिक व्यस्तता के चलते और रिमोट एरियाज में काम करने के कारण इन्टरनेट दूर था अत: आभार प्रदर्शित नहीं कर पा रहा था ... क्षमा चाहता हूँ.
आदरणीय वीनस जी ... आप से दाद मिली तो जिंदगी मिल गई ....धन्यवाद स्नेह बनाए रखिये ... सभी को धन्यवाद
आदरणीय राजेश कुमारी जी  "फूल को ख़ुद में समेटे हुए थी कोई क़िताब" इस मिसरे की तक्तीअ कुछ यूँ की है 
फूल को ख़ुद में समेटे हुए थी कोई क़िताब
२..१..२...२/१....१.२.२./१२.१...२/१..१..२ +१ ....
आप ने ग़ज़ल की सराहना की ..बहुत बहू आभार .. सभी को पुन: धन्यवाद    

Comment by वीनस केसरी on November 17, 2013 at 3:23am

जियो भाई
अच्छी ग़ज़ल कह दी
भई वाह वा
बहुत खूब

Comment by ram shiromani pathak on November 17, 2013 at 12:51am

वो कडी धूप में निकले तो हुआ यूँ महसूस,
जैसे निकली हो पसीने में नहाती ख़ुशबू..........उम्दा  यह शेर बहुत पसंद आया

  
 आदरणीय निलेश जी, हार्दिक बधाई  आपको///सादर  

Comment by विजय मिश्र on November 16, 2013 at 5:44pm
निलेशजी , लबालब है . बहुत बहुत बधाई इस बेहतरीन शीरीं गजल केलिए .आभार
Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 16, 2013 at 3:52pm

आदरणीय नूर जी ..वो कडी धूप में निकले तो हुआ यूँ महसूस,
जैसे निकली हो पसीने में नहाती ख़ुशबू.  ..हर शेर उम्दा ..कई बार पढ़ा ..बड़ी नजाकत से कही है अपने हर बात ..तहे दिल बधाअयीए के साथ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 16, 2013 at 10:24am

वाह्ह्ह बहुत सुन्दर शालीन भाव पूर्ण उम्दा ग़ज़ल नीलेश जी 

दिल के ज़ख्मों से उठी जब से गुलाबी ख़ुशबू,
शह्र में फ़ैल गई मेरी वफ़ा की ख़ुशबू.--------------------वाह क्या रुमानियत अंदाज भरा मतला
...
ये महक, बात नहीं सिर्फ हिना के बस की,
गोरी के हाथों महकती है पिया की ख़ुशबू.------सच कहा हाथों में महक ना होती तो हिना भी किस काम कि
...
फूल को ख़ुद में समेटे हुए थी कोई क़िताब, ------उला का वज्न एक बार जांच लें --एक इस्स्लाह (खुल गया फूल लिए कोई किताबी पन्ना )
फूल से आने लगी आज क़िताबी ख़ुशबू.
...
वो कडी धूप में निकले तो हुआ यूँ महसूस,-----वाह्ह्ह्ह
जैसे निकली हो पसीने में नहाती ख़ुशबू.
....
चंद लम्हात गुज़ारे थे तुम्हारे नज़दीक़,
बस उसी रोज़ से पहनी है तुम्हारी ख़ुशबू. -----बेहतरीन बेहतरीन
बहुत बहुत सुन्दर दिली दाद कबूलें इस ग़ज़ल पर
....
दिल के जंगल में खिला याद का महुआ जो कभी,
‘नूर’ को याद बहुत आई कुँवारी ख़ुशबू.

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